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Csds को बड़ा झटका: icssr अनुदान पर संकट, 83% आय खतरे में

प्रमुख तथ्य 1963 में स्थापित प्रतिष्ठित शोध संस्थान सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (CSDS) को भारी वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) से मिलने वाला…

प्रमुख तथ्य

1963 में स्थापित प्रतिष्ठित शोध संस्थान सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (CSDS) को भारी वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) से मिलने वाला अनुदान, जो CSDS की कुल आय का 83% है, रुकने की कगार पर है। यह कदम CSDS प्रोफेसर संजय कुमार द्वारा चुनावी डेटा को गलत तरीके से पेश करने के विवाद के बाद उठाया गया है, हालांकि उन्होंने बाद में माफी मांग ली थी।

पूरा मामला: क्यों रुक सकता है अनुदान?

ICSSR द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने CSDS के खिलाफ कई अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए रिपोर्ट सौंपी है। समिति में पूर्व UGC सचिव, पूर्व सरकारी लेखा परीक्षक और एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति शामिल हैं। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि CSDS में:

  • शैक्षणिक नियुक्तियां UGC नियमों और आवश्यक योग्यताओं के उल्लंघन में की गईं।
  • वित्तीय मामलों में सामान्य वित्तीय नियमों का पालन नहीं किया गया।
  • गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की नियुक्ति बिना सार्वजनिक विज्ञापन के की गई।

समिति ने ICSSR से अनुदान नियमों के तहत कार्रवाई की सिफारिश की है, जिसमें अनुदान निलंबित करना शामिल हो सकता है। CSDS के अधिकांश कर्मचारियों का वेतन इसी अनुदान से चलता है।

वित्तीय आंकड़े: कितना बड़ा है संकट?

ICSSR की 2024-25 की अनंतिम वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, CSDS की कुल आय 7.562 करोड़ रुपये थी, जिसमें से 6.288 करोड़ रुपये ICSSR से आए। इसमें 5.788 करोड़ रुपये वेतन और भत्तों के लिए तथा 50 लाख रुपये शोध कार्यक्रमों के लिए थे। CSDS ने अपने स्तर पर परियोजनाओं, फेलोशिप और परामर्श से केवल 1.21 करोड़ रुपये जुटाए। इस प्रकार, ICSSR अनुदान CSDS की कुल आय का 83% और वेतन घटक का लगभग 90% है।

विवाद की शुरुआत: संजय कुमार का ट्वीट

अगस्त 2025 में CSDS प्रोफेसर संजय कुमार ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट किया कि महाराष्ट्र के रामटेक और देवलाली में 2024 लोकसभा चुनाव और उसके बाद के विधानसभा चुनावों के बीच पंजीकृत मतदाताओं की संख्या में 36-38% की गिरावट आई है। बाद में उन्होंने माफी मांगते हुए कहा कि शोध टीम ने डेटा गलत पढ़ा था।

इस पर ICSSR ने CSDS को कारण बताओ नोटिस जारी कर 7 दिनों में जवाब मांगा, जिसमें डेटा हेरफेर और मीडिया में गलत जानकारी फैलाकर चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया गया। नोटिस में यूजीसी दिशानिर्देशों के उल्लंघन में संकाय नियुक्तियां, निदेशक नियुक्ति में पारदर्शिता की कमी, और शासी निकाय के अध्यक्ष के चुनाव न कराने जैसे मुद्दे भी उठाए गए।

CSDS का पक्ष और कानूनी लड़ाई

CSDS निदेशक अवधेंद्र शरण ने कहा, "हमें कोई रिपोर्ट नहीं मिली है। जब तक मैं इसे नहीं देख लूंगा, टिप्पणी नहीं कर सकता।" संजय कुमार ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। सूत्रों के अनुसार, CSDS ने अपने जवाब में कहा कि निदेशकों की नियुक्ति सहित सभी कार्य संस्थान के ज्ञापन के अनुसार हैं।

इस बीच, नागपुर और नासिक में संजय कुमार के खिलाफ दो FIR दर्ज की गईं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई पर रोक लगा दी।

पाठकों के लिए महत्वपूर्ण

यह मामला भारत में स्वतंत्र शोध संस्थानों की वित्तीय निर्भरता और सरकारी निगरानी के बीच संतुलन को उजागर करता है। CSDS जैसे संस्थान नीति निर्माण और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के विश्लेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अनुदान में कटौती से उनकी स्वतंत्रता और कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

CSDS पर ICSSR अनुदान क्यों रोका जा सकता है?

जांच समिति ने शैक्षणिक नियुक्तियों में UGC नियमों के उल्लंघन, वित्तीय अनियमितताओं और डेटा हेरफेर जैसे आरोप लगाए हैं।

CSDS की कुल आय में ICSSR का कितना योगदान है?

वित्त वर्ष 2024-25 में CSDS की कुल आय 7.56 करोड़ रुपये थी, जिसमें से 6.28 करोड़ (83%) ICSSR से आया।

क्या CSDS बंद होने की कगार पर है?

अनुदान रुकने से वेतन और शोध गतिविधियां प्रभावित होंगी, लेकिन संस्थान अपने संसाधनों से काम जारी रख सकता है। फिलहाल कोई आधिकारिक निर्णय नहीं हुआ है।

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