मुख्य तथ्य
एक नए अध्ययन में पहली बार जलवायु परिवर्तन के सिंधु नदी प्रणाली में जल उपलब्धता पर प्रभाव का आकलन किया गया है। अध्ययन के अनुसार, रावी, ब्यास और सतलुज (तीन पूर्वी नदियों) के जलग्रहण क्षेत्रों में 1951 से 2024 के बीच वर्षा में 20% की गिरावट आई है। वहीं, सिंधु, झेलम और चिनाब (तीन पश्चिमी नदियों) के जलग्रहण क्षेत्रों में वर्षा में केवल 6% की मामूली कमी देखी गई, जिसे सांख्यिकीय रूप से अमहत्वपूर्ण बताया गया है।
अध्ययन का महत्व
यह निष्कर्ष भारत के उस तर्क को बल देते हैं कि 1960 की सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को जलवायु परिवर्तन और जनसांख्यिकीय बदलावों जैसी नई वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए पुनर्विचार की आवश्यकता है। संधि के तहत तीन पूर्वी नदियों का जल भारत को और तीन पश्चिमी नदियों का जल मुख्यतः पाकिस्तान को आवंटित है।
भारत का रुख
पिछले वर्ष पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने संधि को 'निलंबित' घोषित कर दिया था। इससे पहले 2023 और 2024 में भारत ने पाकिस्तान को कई नोटिस भेजकर संधि की समीक्षा और संशोधन की मांग की थी। भारत का कहना है कि जनसंख्या दबाव, जल की मांग में बदलाव, स्वच्छ ऊर्जा विकास की आवश्यकता और जलवायु-प्रेरित प्रक्रियाओं के कारण जल उपलब्धता में बदलाव ने 'परिस्थितियों में मूलभूत और अप्रत्याशित परिवर्तन' ला दिया है, जिससे संधि में संशोधन आवश्यक हो गया है। पाकिस्तान ने अब तक इन नोटिसों का जवाब नहीं दिया है।
अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष
आईआईटी में सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर विमल मिश्रा और उनके सहयोगी उर्मिन वेगड़ द्वारा किया गया यह अध्ययन पहला डेटा-आधारित साक्ष्य है जो दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण दशकों में नदियों में जल प्रवाह काफी बदल गया है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि सतलुज और रावी उप-बेसिनों में भूजल में महत्वपूर्ण कमी आई है, जबकि चिनाब, झेलम और सिंधु बेसिनों में भूजल स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है।
बांधों पर प्रभाव
अध्ययन में पूर्वी नदियों पर बने प्रमुख बांधों (पोंग, भाखड़ा, थीन) के जलाशयों में वार्षिक जल प्रवाह में 'स्पष्ट गिरावट' पाई गई। उदाहरण के लिए, पोंग बांध के जलाशय में 1951 से 2020 के बीच वार्षिक जल प्रवाह में लगभग 34% की कमी आई। वहीं, पाकिस्तान के प्रमुख बांधों (मंगला और तरबेला) में जल प्रवाह स्थिर रहा, जिनमें बहुत मामूली गिरावट दर्ज की गई।
विशेषज्ञ की राय
प्रोफेसर विमल मिश्रा के अनुसार, 'अधिकांश परिवर्तन प्राकृतिक कारणों से हैं। हो सकता है कि भूजल की कमी मानव निर्मित हो, लेकिन अन्य सभी परिवर्तन प्राकृतिक परिवर्तनशीलता के परिणाम हैं। और ये 1960 में सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर के समय मौजूद स्थिति को बदल देते हैं।'
संधि की दीर्घकालिक स्थिरता पर प्रश्न
अध्ययन में कहा गया है कि ये बड़े पैमाने पर परिवर्तन संधि को दीर्घकाल में असंवहनीय बना सकते हैं। 'संधि 20वीं सदी के मध्य में उन जल-जलवायु परिस्थितियों में डिजाइन की गई थी जो हाल के दौर से काफी भिन्न हैं। संधि के गठन के बाद से सिंधु नदी बेसिन में काफी जल-जलवायु और भू-राजनीतिक परिवर्तन हुए हैं, जिन्होंने इसकी दीर्घकालिक स्थिरता पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं।'
FAQ
सिंधु जल संधि क्या है?
सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई एक संधि है, जो सिंधु नदी प्रणाली के जल बंटवारे को नियंत्रित करती है। इसके तहत तीन पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास, सतलुज) का जल भारत को और तीन पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) का जल मुख्यतः पाकिस्तान को आवंटित है।
अध्ययन में क्या पाया गया?
अध्ययन में पाया गया कि पूर्वी नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में वर्षा में 20% की गिरावट आई है, जबकि पश्चिमी नदियों में मामूली (6%) गिरावट दर्ज की गई। साथ ही, पूर्वी नदियों पर बने बांधों (जैसे पोंग, भाखड़ा, थीन) में जल प्रवाह में भारी कमी आई है।
भारत ने संधि को लेकर क्या रुख अपनाया है?
भारत ने पिछले वर्ष पहलगाम आतंकी हमले के बाद संधि को 'निलंबित' घोषित कर दिया था और पाकिस्तान से संधि की समीक्षा एवं संशोधन की मांग की है। भारत का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण संधि में संशोधन आवश्यक है।
क्या यह अध्ययन संधि के पुनर्विचार के लिए साक्ष्य प्रदान करता है?
हां, यह पहला डेटा-आधारित अध्ययन है जो दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण नदियों में जल प्रवाह में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं, जिससे 1960 की संधि की स्थिरता पर प्रश्नचिह्न लगता है।