मुख्य तथ्य
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में स्थित देहुरी का तीन दिवसीय 20 आषाढ़ मेला सोमवार को संपन्न हो गया। मेले के अंतिम दिन देवता खुडीजल की सौह से आए देवता लोमश ऋषि के देवलुओं (मंदिर सेवकों) ने चोला कलगी (पारंपरिक वस्त्र और मुकुट) धारण कर पारंपरिक नाटी प्रस्तुत की।
मेले का विवरण
मेले के समापन पर देवलुओं ने चोला कलगी में सजकर नाटी की शुरुआत की, जिसके बाद बड़ी संख्या में स्थानीय लोग भी झूमने लगे। इस दौरान देवताओं ने ढोल-नगाड़ों की थाप पर देव नृत्य भी किया। सुबह हुई बारिश के बावजूद भारी संख्या में श्रद्धालु मेले में पहुंचे।
प्रभाव और श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया
मेले में देवता लोमश ऋषि के आगमन ने इसे यादगार बना दिया। कारदार शेर सिंह, पूर्ण शर्मा, शिव राम शर्मा, देवलू देवेंद्र सिंह और टेक सिंह ने बताया कि देवता के साथ कलाकारों की नाटी देखने के लिए कुल्लू-मंडी जिले के लोग बड़ी संख्या में उमड़े। मेले के समापन के बाद देवता अपने देवालय लौट गए।
पाठकों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी
- यह मेला प्रतिवर्ष 20 आषाढ़ को देहुरी, कुल्लू में आयोजित होता है।
- चोला कलगी पहनकर नाटी डालना इस क्षेत्र की सदियों पुरानी परंपरा है।
- मेले में देव नृत्य और स्थानीय संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
देहुरी मेला कहाँ लगता है?
देहुरी मेला हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में लगता है।
20 आषाढ़ मेले में क्या विशेष रहा?
इस मेले में देवता लोमश ऋषि के देवलुओं ने चोला कलगी पहनकर पारंपरिक नाटी डाली, जो आकर्षण का केंद्र रही।
मेले में कितने दिन चला?
यह तीन दिवसीय मेला था, जिसका समापन सोमवार को हुआ।