Desh Duniya | अत्यधिक वर्षा

ट्रॉपिकल वेव्स का भारत के पश्चिमी तट पर अत्यधिक वर्षा से गहरा संबंध: शोध

मुख्य तथ्य कोचीन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (Cusat) के उन्नत वायुमंडलीय रडार अनुसंधान केंद्र के शोधकर्ताओं ने ब्रिटेन और फ्रांस के वैज्ञानिकों के सहयोग से एक अध्ययन में पाया है कि उष्णकटिबंधीय वायुमंडलीय तरंगें…

मुख्य तथ्य

कोचीन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (Cusat) के उन्नत वायुमंडलीय रडार अनुसंधान केंद्र के शोधकर्ताओं ने ब्रिटेन और फ्रांस के वैज्ञानिकों के सहयोग से एक अध्ययन में पाया है कि उष्णकटिबंधीय वायुमंडलीय तरंगें भारत के पश्चिमी तट पर अत्यधिक वर्षा की घटनाओं को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती हैं। यह अध्ययन Scientific Reports में प्रकाशित हुआ है।

शोध का विवरण

शोध दल का नेतृत्व प्रज्वल के और अजिल कोट्टायिल ने किया, जिसमें यूके मेट ऑफिस के प्रिंस जेवियर और फ्रांस के एलएमडी से ऑरेलियन पोडग्लाजेन शामिल थे। अध्ययन में पाया गया कि केल्विन, रॉस्बी और मिश्रित रॉस्बी-ग्रेविटी तरंगें अरब सागर और पश्चिमी घाट के ऊपर गहरे संवहनी बादल तंत्र को संगठित करके और नमी संचय को बढ़ाकर भारी वर्षा को तीव्र करती हैं।

रॉस्बी तरंगों का प्रभाव

शोध के अनुसार, रॉस्बी तरंगों का सबसे अधिक प्रभाव पाया गया, जो भूमि पर अत्यधिक वर्षा को 20-60% तक बढ़ा देती हैं। यह क्षेत्र में वर्षा की चरम घटनाओं को नियंत्रित करने में इन तरंगों की भूमिका का पहला व्यापक मूल्यांकन है। केरल के लिए यह निष्कर्ष विशेष महत्व रखते हैं, जहाँ हाल के वर्षों में विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन हुए हैं।

ऐतिहासिक घटनाओं से संबंध

अध्ययन में देखा गया कि 2018 और 2019 की विनाशकारी वर्षा की घटनाएँ, जिन्होंने केरल में व्यापक बाढ़ पैदा की, मजबूत रॉस्बी तरंग गतिविधि से जुड़ी थीं। इसी तरह, 2024 के वायनाड भूस्खलन, जिसमें लगभग 300 लोग मारे गए, तीव्र केल्विन तरंग गतिविधि के साथ मेल खाते हैं।

प्रभाव और भविष्य की संभावनाएँ

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस अध्ययन का सबसे आशाजनक परिणाम प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों में सुधार की संभावना है। अजिल कोट्टायिल ने कहा, “स्थानीय गरज के विपरीत, जिनका पूर्वानुमान लगाना कठिन है, उष्णकटिबंधीय तरंग गतिविधि को कई दिन पहले मॉनिटर किया जा सकता है। इन संकेतों को मौसम पूर्वानुमान मॉडल में शामिल करने से भारी वर्षा का अनुमान लगाने और आपदा जोखिम को कम करने के लिए मूल्यवान समय मिल सकता है।”

जलवायु परिवर्तन के कारण महासागरों के गर्म होने और जल चक्र के तीव्र होने के साथ, इन वायुमंडलीय तरंगों की बेहतर समझ कमजोर तटीय क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा के लिए तैयारी को मजबूत कर सकती है। यह अध्ययन पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा वित्तपोषित परियोजना का हिस्सा था।

पाठकों के लिए महत्वपूर्ण

  • यह शोध बताता है कि उष्णकटिबंधीय तरंगों की निगरानी से अत्यधिक वर्षा की भविष्यवाणी में सुधार हो सकता है।
  • केरल जैसे राज्यों के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जहाँ बाढ़ और भूस्खलन का खतरा अधिक है।
  • मौसम विभाग इन निष्कर्षों को अपने पूर्वानुमान मॉडल में शामिल कर सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ट्रॉपिकल वेव्स क्या हैं?

ट्रॉपिकल वेव्स वायुमंडलीय गड़बड़ियाँ हैं जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बादलों और वर्षा को प्रभावित करती हैं। इनमें केल्विन, रॉस्बी और मिश्रित रॉस्बी-ग्रेविटी तरंगें शामिल हैं।

इस शोध का केरल के लिए क्या महत्व है?

केरल में 2018, 2019 की बाढ़ और 2024 के वायनाड भूस्खलन जैसी आपदाएँ इन तरंगों से जुड़ी पाई गई हैं। इससे पूर्व चेतावनी प्रणाली को बेहतर बनाकर जान-माल की हानि को कम किया जा सकता है।

क्या इन तरंगों का उपयोग मौसम पूर्वानुमान में किया जा सकता है?

हाँ, स्थानीय तूफानों की तुलना में इन तरंगों की गतिविधि कई दिन पहले देखी जा सकती है, जिससे मौसम मॉडल में शामिल करके अत्यधिक वर्षा का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।

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