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Tripura: सरेंडर कर चुके उग्रवादियों का 72 घंटे का हड़ताल, पुनर्वास पैकेज में देरी का आरोप

प्रमुख तथ्य त्रिपुरा में प्रतिबंधित उग्रवादी संगठनों नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (NLFT) और ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स (ATTF) के सरेंडर किए गए सदस्यों ने शुक्रवार को 72 घंटे की हड़ताल शुरू कर दी। उनका…

प्रमुख तथ्य

त्रिपुरा में प्रतिबंधित उग्रवादी संगठनों नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (NLFT) और ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स (ATTF) के सरेंडर किए गए सदस्यों ने शुक्रवार को 72 घंटे की हड़ताल शुरू कर दी। उनका आरोप है कि केंद्र और राज्य सरकार ने लगभग दो साल पहले हुए शांति समझौते के तहत वादा किए गए पुनर्वास उपायों को लागू नहीं किया है।

हड़ताल का विवरण

प्रदर्शनकारियों ने खोवाई जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग और रेलवे ट्रैक के कुछ हिस्सों को जाम कर दिया। उनकी मांग है कि ₹250 करोड़ के पुनर्वास पैकेज को लागू किया जाए, जो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में नई दिल्ली में हस्ताक्षरित चतुर्भुजीय समझौते का हिस्सा था। अब तक किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं है।

समझौते की पृष्ठभूमि

यह समझौता 4 सितंबर 2024 को मुख्यमंत्री माणिक साहा, भाजपा सहयोगी तिपरा मोथा के संस्थापक प्रद्योत किशोर देवबर्मा और गृह मंत्रालय के अधिकारियों की उपस्थिति में हुआ था। इसके तहत केंद्र ने उग्रवादियों के पुनर्वास के लिए ₹250 करोड़ का पैकेज स्वीकृत किया था।

प्रदर्शनकारियों का बयान

एक प्रदर्शनकारी ने कहा, "4 सितंबर 2024 को एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे जिसमें तिपरासों को ₹250 करोड़ का पुनर्वास पैकेज देने का वादा किया गया था। समझौते पर हस्ताक्षर करने के लगभग दो साल बीत गए, लेकिन इसका कुछ भी लागू नहीं हुआ। हमने केंद्र और राज्य सरकार को कई बार पत्र लिखा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इसके विरोध में हम शुक्रवार से 72 घंटे की हड़ताल कर रहे हैं।"

सरकार से बातचीत

प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, गृह सचिव, जनजातीय कल्याण मंत्री और जनजातीय कल्याण सचिव को पत्र लिखकर अपनी मांगों को पूरा करने का अनुरोध किया, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। उन्होंने गुरुवार को जनजातीय कल्याण मंत्री बिकाश देवबर्मा के साथ बैठक भी की, लेकिन बातचीत विफल रही, जिसके बाद उन्होंने 72 घंटे की हड़ताल शुरू कर दी।

उग्रवादियों का आत्मसमर्पण

सितंबर 2024 में, NLFT और ATTF के कम से कम 584 उग्रवादियों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। यह केंद्र सरकार द्वारा त्रिपुरा सरकार और दोनों उग्रवादी समूहों के साथ चतुर्भुजीय समझौते पर हस्ताक्षर करने के तीन सप्ताह बाद हुआ। NLFT के तीन गुटों के नेता बिश्वमोहन देवबर्मा, परिमल देवबर्मा और प्रसेनजीत देवबर्मा तथा ATTF के अध्यक्ष अलेंद्र देवबर्मा ने जम्पुइजाला स्थित त्रिपुरा स्टेट राइफल्स की 7वीं बटालियन मुख्यालय में अपने हथियार सरेंडर कर दिए।

त्रिपुरा में उग्रवाद का इतिहास

त्रिपुरा में 1980 से 2000 के दशक की शुरुआत तक NLFT और ATTF सहित कई प्रतिबंधित उग्रवादी संगठनों ने हिंसा की घटनाओं को अंजाम दिया। NLFT की स्थापना 12 मार्च 1989 को धनंजय रियांग ने की थी, जो त्रिपुरा नेशनल वालंटियर्स (TNV) के पूर्व उग्रवादी नेता थे। TNV ने 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और TNV प्रमुख बिजॉय कुमार हरंगखल के बीच शांति समझौते के बाद हथियार डाल दिए थे। बाद में NLFT का नेतृत्व नयनबासी जमातिया को मिला।

ATTF की स्थापना जुलाई 1990 में TNV के पूर्व सदस्यों द्वारा की गई थी। शुरू में इसे ऑल त्रिपुरा ट्राइबल फोर्स नाम दिया गया, बाद में 1992 में इसका नाम बदलकर ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स (ATTF) कर दिया गया, जिसका सुप्रीमो रंजीत देवबर्मा था।

सरकार की कार्रवाई

भारत सरकार ने 1997 में NLFT और ATTF को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के तहत प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन घोषित किया। इन संगठनों को 2002 के आतंकवाद निरोधक अधिनियम (POTA) के तहत भी प्रतिबंधित किया गया था।

FAQ

सरेंडर किए उग्रवादियों ने हड़ताल क्यों शुरू की?

उन्होंने ₹250 करोड़ के पुनर्वास पैकेज के कार्यान्वयन में देरी के विरोध में 72 घंटे की हड़ताल शुरू की, जो सितंबर 2024 में हुए समझौते का हिस्सा था।

हड़ताल के दौरान क्या कार्रवाई की गई?

प्रदर्शनकारियों ने खोवाई जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग और रेलवे ट्रैक के कुछ हिस्सों को जाम कर दिया।

समझौते पर कब और किसके नेतृत्व में हस्ताक्षर हुए?

यह समझौता 4 सितंबर 2024 को नई दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में हुआ था।

NLFT और ATTF का गठन कब हुआ था?

NLFT का गठन 12 मार्च 1989 को और ATTF का गठन जुलाई 1990 में हुआ था।

स्रोत: www.hindustantimes.com

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