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तमिलनाडु में ‘राजस्व पतन’ से तीन तरह से प्रभावित हो रही है जनता: श्वेत पत्र

मुख्य तथ्य तमिलनाडु सरकार द्वारा जारी एक श्वेत पत्र में राज्य के राजस्व संग्रह में आई गिरावट को ‘राजस्व पतन’ (revenue collapse) करार दिया गया है। वित्त मंत्री एन. मैरी विल्सन ने मंगलवार को चेन्नई…

मुख्य तथ्य

तमिलनाडु सरकार द्वारा जारी एक श्वेत पत्र में राज्य के राजस्व संग्रह में आई गिरावट को 'राजस्व पतन' (revenue collapse) करार दिया गया है। वित्त मंत्री एन. मैरी विल्सन ने मंगलवार को चेन्नई में यह दस्तावेज़ जारी किया। इसमें बताया गया है कि यह प्रवृत्ति राज्य की जनता को तीन तरीकों से प्रभावित कर रही है।

विस्तृत जानकारी

श्वेत पत्र के अनुसार, राज्य के स्वयं के कर राजस्व (SOTR) और सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का अनुपात लगातार गिर रहा है। वर्ष 2025-26 के लिए अनंतिम आंकड़ों के अनुसार, SOTR ₹1,92,493 करोड़ और कुल राजस्व प्राप्तियाँ (TRR) ₹2,93,763 करोड़ हैं। SOTR कुल राजस्व का लगभग दो-तिहाई हिस्सा है।

पहला प्रभाव: नई योजनाओं के लिए अधिक उधारी

दस्तावेज़ में कहा गया है, "जैसे-जैसे राज्य का राजस्व प्रयास घटा है, आर्थिक विस्तार से राजकोषीय स्थान में कोई प्राकृतिक वृद्धि नहीं हुई है।" जिस राज्य का कर-से-GSDP अनुपात बढ़ रहा है, वह विकास के राजस्व लाभांश से नए कार्यक्रमों को वित्तपोषित कर सकता है। लेकिन जिस राज्य का अनुपात गिर रहा है, उसे हर नई प्रतिबद्धता के लिए उधार लेना पड़ता है, जिससे ऋण की गतिशीलता और जटिल हो जाती है।

दूसरा प्रभाव: राजकोषीय स्वायत्तता में कमी

तमिलनाडु संघ करों में अधिक हिस्सेदारी और राजकोषीय स्वायत्तता के लिए लड़ रहा है, लेकिन उसके अपने प्रयास 'निराशाजनक' रहे हैं। GST, शराब और ईंधन पर कर, पंजीकरण और मोटर वाहन कर जैसे प्रमुख घटकों में SOTR बढ़ाने में विफलता ने उसकी बातचीत की स्थिति को कमजोर किया है। श्वेत पत्र के अनुसार, "इससे राज्य की बातचीत की स्थिति कमजोर होती है और अधिक राजकोषीय स्थान के दावों की विश्वसनीयता कम होती है।"

तीसरा प्रभाव: ऋण का बोझ अगली पीढ़ी पर

दस्तावेज़ में चेतावनी दी गई है, "आज जो राजस्व नहीं उगाहा जाता, वह कल का ऋण बन जाता है जिसे चुकाना होगा।" 2006-07 के SOTR-से-GSDP अनुपात को ध्यान में रखते हुए, प्रति वर्ष ₹1.23 लाख करोड़ का राजस्व छूट गया है। यह एक बार का नुकसान नहीं, बल्कि एक स्थायी वार्षिक घाटा है जो स्थायी ऋण बोझ में बदल जाता है। श्वेत पत्र ने इसे "समीक्षाधीन अवधि की परिभाषित राजकोषीय असमानता" बताया है।

प्रभाव और विश्लेषण

श्वेत पत्र ने निष्कर्ष निकाला कि "राजस्व अंतर संरचनात्मक आर्थिक सीमा का परिणाम नहीं है।" तमिलनाडु के पास महाराष्ट्र के बाद दूसरा सबसे बड़ा GSDP है, विविध औद्योगिक और सेवा अर्थव्यवस्था है, और एक बड़ा औपचारिक क्षेत्र कर आधार है। समाधान के रूप में "राजस्व कमाने वाले विभागों में प्रणालीगत भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, अनुपालन प्रवर्तन और गाइडलाइन वैल्यू का युक्तिकरण" सुझाया गया है। साथ ही, "लीकेज और भ्रष्टाचार में कटौती के माध्यम से अतिरिक्त संसाधन जुटाने के साथ कल्याणकारी योजनाओं और पूंजीगत व्यय को संतुलित करने की इच्छाशक्ति" की आवश्यकता पर बल दिया गया है, जिससे लोगों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।

पाठकों के लिए महत्वपूर्ण बातें

  • तमिलनाडु में राजस्व संग्रह में गिरावट से नई योजनाओं के लिए उधारी बढ़ रही है, जिससे ऋण का बोझ बढ़ रहा है।
  • राज्य की वित्तीय स्वायत्तता कमजोर हो रही है, जिससे केंद्र से अधिक संसाधनों की मांग कमजोर पड़ती है।
  • आज का राजस्व घाटा कल के ऋण के रूप में अगली पीढ़ी पर बोझ डालेगा।
  • समाधान भ्रष्टाचार नियंत्रण और कर अनुपालन बढ़ाने में निहित है, न कि कर दरें बढ़ाने में।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

श्वेत पत्र में 'राजस्व पतन' से क्या तात्पर्य है?

इसका तात्पर्य राज्य के स्वयं के कर राजस्व (SOTR) और सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के अनुपात में लगातार गिरावट से है, जिससे राज्य की वित्तीय क्षमता कमजोर हुई है।

राजस्व पतन के तीन मुख्य प्रभाव क्या हैं?

पहला, नई योजनाओं के लिए अधिक उधारी की आवश्यकता; दूसरा, राज्य की वित्तीय स्वायत्तता में कमी; तीसरा, ऋण का बोझ अगली पीढ़ी पर पड़ना।

श्वेत पत्र के अनुसार राजस्व अंतर का कारण क्या है?

यह संरचनात्मक आर्थिक सीमा नहीं, बल्कि राजस्व विभागों में भ्रष्टाचार, अनुपालन प्रवर्तन की कमी और गाइडलाइन वैल्यू के युक्तिकरण में विफलता है।

स्रोत: www.thehindu.com

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