मुख्य तथ्य
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकार संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली चार हाईकोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। केंद्र ने सभी मामलों को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया था ताकि अलग-अलग निर्णयों से बचा जा सके।
विस्तृत जानकारी
पीठ ने कहा, "यह बेहतर होगा कि सभी मामलों को या तो एक हाईकोर्ट में उठाया जाए या हम खुद तय करें।" इसके साथ ही अदालत ने सभी हाईकोर्ट में कार्यवाही पर रोक लगा दी। मामले की अगली सुनवाई जुलाई में होगी।
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि एक ही कानून की संवैधानिक वैधता पर कई हाईकोर्ट में सुनवाई हो रही है, जबकि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही इस मुद्दे पर विचार कर रहा है।
प्रभाव
यह आदेश ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि संशोधन अधिनियम 2026 ने स्व-पहचान के सिद्धांत को कमजोर किया है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के एनएएलएसए मामले में मान्यता दी थी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नई परिभाषा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को चिकित्सा प्रमाणपत्र और सरकारी प्रमाणन पर निर्भर करती है, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत उनके अधिकारों का उल्लंघन है।
पाठकों के लिए महत्वपूर्ण
- सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान, दिल्ली, कर्नाटक और केरल हाईकोर्ट में लंबित याचिकाओं पर सुनवाई पर रोक लगा दी है।
- केंद्र सरकार का तर्क है कि संशोधन स्वैच्छिक उपचार पर प्रतिबंध नहीं लगाता, बल्कि जबरन प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है।
- याचिकाकर्ताओं का कहना है कि संशोधन में ट्रांसजेंडर की परिभाषा को संकुचित कर दिया गया है, जिससे कई लोग बाहर हो जाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट ने किन हाईकोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाई?
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान, दिल्ली, कर्नाटक और केरल हाईकोर्ट में लंबित याचिकाओं पर सुनवाई पर रोक लगा दी है।
ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम 2026 में मुख्य बदलाव क्या है?
संशोधन में ट्रांसजेंडर की परिभाषा को बदलकर विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों या चिकित्सीय स्थितियों तक सीमित कर दिया गया है, जिससे स्व-पहचान के सिद्धांत को कमजोर किया गया है।
केंद्र सरकार का तर्क क्या है?
केंद्र का कहना है कि संशोधन स्वैच्छिक लिंग-पुष्टि उपचार पर प्रतिबंध नहीं लगाता, बल्कि केवल जबरन प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है।