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सुप्रीम कोर्ट ने विकलांग बच्चों के पुनर्वास केंद्रों पर सुनवाई की, जारी किया नोटिस

प्रमुख तथ्य सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (16 जून, 2026) को विकलांग बच्चों के पुनर्वास केंद्रों, बाल विकास केंद्रों और मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों की निगरानी और ओवरसाइट की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर नोटिस…

प्रमुख तथ्य

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (16 जून, 2026) को विकलांग बच्चों के पुनर्वास केंद्रों, बाल विकास केंद्रों और मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों की निगरानी और ओवरसाइट की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर नोटिस जारी किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस मामले को प्राथमिकता से सुनवाई योग्य माना।

याचिका में उठाए गए मुद्दे

विकलांगता अधिकारों के वकील राहुल बजाज और बाल अधिकार कार्यकर्ता ज़हीर अब्बास जान द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि विकलांग बच्चों के पुनर्वास केंद्रों की स्थिति विधायी इरादे और कार्यान्वयन के बीच एक 'महत्वपूर्ण अंतर' को दर्शाती है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD) 2016, पुनर्वास परिषद अधिनियम (RCI) 1992, और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम (MHCA) 2017 के तहत वैधानिक सुरक्षा उपायों का अक्सर पालन नहीं किया जाता है।

  • प्रशिक्षित कर्मियों की कमी के कारण बच्चों को आवश्यक चिकित्सा से वंचित रखा जाता है।
  • अपर्याप्त पर्यवेक्षण और उपेक्षा के कारण बच्चे असुरक्षित परिस्थितियों के संपर्क में आते हैं।
  • केवल पांच राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए न्यूनतम गुणवत्ता मानक तय किए हैं।

अनियमित चिकित्सा पद्धतियां

याचिका में कहा गया है, 'अनियमित चिकित्सीय मूल्यांकन, चिकित्सा सेवाओं का अचानक बंद होना, और पुनर्वास संस्थानों द्वारा जबरदस्ती का आचरण सीधे तौर पर विकलांग बच्चों के सर्वोत्तम हितों, विकासात्मक अधिकारों और गरिमा को कमजोर करता है।' अदालत को बताया गया कि याचिकाकर्ताओं को माता-पिता से शिकायतें मिली हैं, जिनमें कहा गया है कि कुछ मानसिक स्वास्थ्य संस्थान ऑटिज्म और ADHD जैसी स्थितियों को 'ठीक' करने के झूठे वादे करते हैं और बिना किसी वैज्ञानिक आधार के अत्यधिक शुल्क वसूलते हैं।

गोपनीयता का उल्लंघन

याचिका में जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के एक माता-पिता की शिकायत का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें पुनर्वास केंद्रों द्वारा माता-पिता की सहमति के बिना बच्चों की तस्वीरों और वीडियो के अनधिकृत उपयोग का आरोप लगाया गया है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, ऐसी शिकायतें 'प्रणालीगत कमियों' की ओर इशारा करती हैं, जिनमें अयोग्य पेशेवरों की भागीदारी और पारदर्शिता तथा जवाबदेही तंत्र का अभाव शामिल है।

संवैधानिक अधिकारों का हनन

याचिका में कहा गया है, 'विकास के महत्वपूर्ण चरण में बच्चों के लिए समय पर चिकित्सीय हस्तक्षेप की अनुपस्थिति के दीर्घकालिक गंभीर परिणाम होते हैं, जो अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानजनक जीवन के उनके अधिकार और अनुच्छेद 21-ए के तहत शिक्षा के अधिकार को कमजोर करता है।' याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा की संवैधानिक गारंटी के लिए आवश्यक है कि विकलांग बच्चों के लिए चिकित्सीय मूल्यांकन और पुनर्वास हस्तक्षेप 'व्यक्तिगत, साक्ष्य-आधारित और रूढ़िवादी या अवैज्ञानिक धारणाओं से मुक्त' हों।

अदालत से मांग

याचिका में शीर्ष अदालत से राज्य सरकारों को मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों के पंजीकरण और निरीक्षण को नियंत्रित करने वाले वैधानिक सुरक्षा उपायों को लागू करने और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए न्यूनतम गुणवत्ता मानक निर्धारित करने के निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया है। याचिकाकर्ताओं ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों के पंजीकरण के लिए एक समयबद्ध तंत्र स्थापित करने के निर्देश भी मांगे हैं।

FAQ

सुप्रीम कोर्ट ने किस याचिका पर नोटिस जारी किया?

सुप्रीम कोर्ट ने विकलांग बच्चों के पुनर्वास केंद्रों की निगरानी और ओवरसाइट की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर नोटिस जारी किया।

याचिका में क्या आरोप लगाए गए हैं?

याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुनर्वास केंद्रों में प्रशिक्षित कर्मियों की कमी, अनियमित चिकित्सा मूल्यांकन, और बच्चों की तस्वीरों का अनधिकृत उपयोग जैसी समस्याएं हैं।

कितने राज्यों ने मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए न्यूनतम गुणवत्ता मानक तय किए हैं?

याचिका के अनुसार, केवल पांच राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ऐसे मानक तय किए हैं।

स्रोत: www.thehindu.com

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