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शरावती बांध विस्थापित: तीन पीढ़ियां बीत गईं, जमीन का मालिकाना हक नहीं

मुख्य तथ्य शिवमोग्गा में आयोजित एक कार्यशाला में सेवानिवृत्त वन संरक्षक (APCCF) ए.एम. अन्नैया ने कहा कि शरावती बांध परियोजना से विस्थापित लोगों को तीन पीढ़ियों बाद भी जमीन का मालिकाना हक नहीं मिला है।…

मुख्य तथ्य

शिवमोग्गा में आयोजित एक कार्यशाला में सेवानिवृत्त वन संरक्षक (APCCF) ए.एम. अन्नैया ने कहा कि शरावती बांध परियोजना से विस्थापित लोगों को तीन पीढ़ियों बाद भी जमीन का मालिकाना हक नहीं मिला है। उन्होंने बताया कि 1960 के दशक में विस्थापित परिवारों को खाली जमीन पर 'डंप' कर दिया गया, जहां उन्होंने दशकों तक खेती की, लेकिन उनके पास कोई दस्तावेज नहीं हैं।

विस्थापन की कहानी

शनिवार को शिवमोग्गा में 'मलनाड: कृषि-वन संघर्ष और सद्भाव' विषयक कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए अन्नैया ने कहा, "शरावती बांध परियोजना से विस्थापित लोगों को खाली जमीन पर 'डंप' कर दिया गया, जिसे उन्होंने दशकों तक खेती की, फिर भी उनके पास स्वामित्व के दस्तावेज नहीं हैं।" उन्होंने कहा कि तब से तीन पीढ़ियां बीत चुकी हैं, लेकिन किसानों को अपनी जमीन का मालिकाना हक नहीं मिला है। हैरानी की बात है कि इस जिले ने राज्य को चार मुख्यमंत्री दिए हैं, फिर भी विस्थापितों की समस्या का समाधान नहीं हुआ।

वन-कृषि संघर्ष

अन्नैया ने बताया कि शिवमोग्गा जिले का 64% क्षेत्र वनों से आच्छादित है, जिससे किसानों और वन विभाग के बीच संघर्ष गंभीर है। 1988 की राष्ट्रीय वन नीति ने वनों में अतिक्रमण या अवैध कब्जे के नियमितीकरण पर रोक लगा दी। उन्होंने कहा, "वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए वनों का संरक्षण आवश्यक है। नदियों, वनों और वन्यजीवों की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है।"

उन्होंने गोडावर्मन थिरुमलपद बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख किया, जिसने वनों की शब्दकोश परिभाषा को मान्यता दी, चाहे भूमि का स्वामित्व और वर्गीकरण कुछ भी हो। इस फैसले ने वन भूमि पर दावों को और कठिन बना दिया।

विशेषज्ञों की राय

कर्नाटक राज्य नीति और योजना आयोग के सदस्य एवं कृषि-अर्थशास्त्री प्रकाश कम्माराडी ने अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में कहा कि हाल के वर्षों में कृषि और वानिकी के बीच का संबंध टूट गया है, जिससे संघर्ष बढ़े हैं। पश्चिमी घाट जैव विविधता हॉटस्पॉट के बजाय संघर्ष हॉटस्पॉट बन गए हैं। उन्होंने कहा, "कृषि और वानिकी के बीच सद्भाव बहाल करने की आवश्यकता है।"

कार्यशाला में कुवेम्पु विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त रजिस्ट्रार टी.एस. हुवैया गौड़ा और पर्यावरण अध्ययन केंद्र के जी.एल. जनार्दन भी उपस्थित थे।

पाठकों के लिए महत्वपूर्ण बातें

  • शरावती बांध परियोजना से विस्थापित परिवारों को तीन पीढ़ियों बाद भी जमीन का कानूनी हक नहीं मिला है।
  • शिवमोग्गा जिले में 64% वन क्षेत्र होने के कारण किसानों और वन विभाग के बीच संघर्ष जारी है।
  • 1988 की राष्ट्रीय वन नीति और सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने वन भूमि पर दावों को और कठिन बना दिया है।
  • विशेषज्ञों ने कृषि और वानिकी के बीच सद्भाव बहाल करने पर जोर दिया।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शरावती बांध परियोजना से कितने परिवार विस्थापित हुए?

रिपोर्ट में सटीक संख्या नहीं दी गई है, लेकिन 1960 के दशक में हजारों परिवार विस्थापित हुए थे।

विस्थापितों को जमीन का मालिकाना हक क्यों नहीं मिला?

उन्हें खाली जमीन पर बसाया गया, लेकिन दस्तावेज नहीं दिए गए। 1988 की राष्ट्रीय वन नीति के बाद अतिक्रमण नियमितीकरण पर रोक लग गई।

इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का क्या फैसला है?

गोडावर्मन थिरुमलपद बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वनों की शब्दकोश परिभाषा को मान्यता दी, जिससे वन भूमि पर दावे कठिन हो गए।

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