मुख्य तथ्य
यूट्यूबर 'सवुक्कू शंकर' उर्फ ए. शंकर (50) ने मद्रास हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर कर निदेशक, सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (DVAC) ए. अरुण के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) जांच की मांग की है। याचिका में हाईकोर्ट की एक खंडपीठ द्वारा श्री अरुण के खिलाफ की गई गंभीर टिप्पणियों का हवाला दिया गया है।
विस्तृत जानकारी
याचिकाकर्ता ने बताया कि न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और वी. लक्ष्मीनारायणन की खंडपीठ ने श्री अरुण को उनके कार्यकाल में ग्रेटर चेन्नई पुलिस आयुक्त के रूप में रियल्टर संतोष शर्मा के खिलाफ 'बाहरी कारणों से' निवारक निरोध आदेश पारित करने के लिए फटकार लगाई थी। खंडपीठ ने यह भी कहा कि श्री अरुण 'गुंडा अधिनियम' के तहत ऐसे आदेश पारित करने के 'आदी' हैं, और इसी अधिकारी द्वारा याचिकाकर्ता और पत्रकार आर. वराकी के खिलाफ पारित समान आदेशों को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था।
खंडपीठ ने कहा कि रियल्टर के खिलाफ आदेश 'जानबूझकर' पारित किया गया था, जबकि उससे सार्वजनिक व्यवस्था को कोई खतरा नहीं था और उसके खिलाफ केवल कुछ धोखाधड़ी के मामले थे, जिनमें डीएमडीके राज्यसभा सदस्य एल.के. सुधीश की पत्नी एस. पूर्णजोती की शिकायत पर दर्ज एक मामला भी शामिल था।
अपने फैसले में न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने लिखा: “निरोध प्राधिकारी (श्री अरुण) पूरी तरह से जानते थे कि यह मामला सार्वजनिक व्यवस्था की श्रेणी में नहीं आता। वे यह भी जानते थे कि वे कम से कम दो साल पहले हुई घटनाओं पर भरोसा कर रहे हैं। निरोध प्राधिकारी कोई नौसिखिया नहीं है। वह आईपीएस के सीधे भर्ती अधिकारी हैं और विभिन्न क्षमताओं में कार्य कर चुके हैं। यदि 28 वर्षों के अनुभव के बाद भी ऐसा आदेश पारित किया जा सकता है, तो इसका मतलब केवल यह हो सकता है कि यह जानबूझकर और कानून एवं तथ्यों की पूर्ण जानकारी के साथ किया गया।”
न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने यह भी कहा: “हम अपनी गंभीर पीड़ा और नाराजगी व्यक्त करते हैं। हम श्री अरुण, आईपीएस द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण को अस्वीकार करते हैं। विवादित आदेश जानबूझकर पारित किया गया है। हम सामान्यतः ऐसी टिप्पणी नहीं करते, लेकिन हम ऐसा करने के लिए बाध्य हैं क्योंकि श्री अरुण आईपीएस ऐसे आदेश जारी करने के आदी हैं, जिनमें से अधिकांश इस न्यायालय के संज्ञान में आए हैं और रद्द किए गए हैं।”
प्रभाव और आगे की कार्रवाई
श्री शंकर ने अपनी याचिका में कहा कि न्यायालय द्वारा श्री अरुण के खिलाफ की गई टिप्पणियां आकस्मिक या प्रासंगिक नहीं हैं, बल्कि “निवारक निरोध शक्तियों के प्रयोग के संबंध में एक गंभीर न्यायिक निंदा का गठन करती हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले मामले में उक्त अधिकारी की कार्रवाई की सद्भावना और औचित्य को सीधे प्रभावित करती हैं।”
याचिकाकर्ता ने कहा कि एक न्यायिक निष्कर्ष कि पुलिस अधिकारी ने 'बाहरी कारणों से' अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया, अधिकार के दुरुपयोग की गंभीर चिंताएं पैदा करता है और तत्काल जांच की आवश्यकता है। उन्होंने खेद व्यक्त किया कि श्री अरुण के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई, जबकि उन्होंने 2 जून, 2026 को सतर्कता आयुक्त को इस संबंध में एक प्रतिनिधित्व दिया था।
उन्होंने यह भी कहा कि स्पष्ट न्यायिक निष्कर्षों के बावजूद अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करने में निरंतर विफलता न्याय प्रशासन में जनता के विश्वास को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करेगी, खासकर जब संबंधित अधिकारी वर्तमान में DVAC के प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं, जो सत्यनिष्ठा और जवाबदेही के उच्चतम मानकों की मांग करता है।
पाठकों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी
- याचिका में CBI जांच की मांग की गई है, जो DVAC प्रमुख के खिलाफ एक गंभीर कदम है।
- मद्रास हाईकोर्ट ने पहले ही श्री अरुण के निरोध आदेशों को 'जानबूझकर' और 'आदतन' करार दिया है।
- यह मामला निवारक निरोध शक्तियों के दुरुपयोग और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मुद्दे को उठाता है।
FAQ
सवुक्कू शंकर कौन हैं?
सवुक्कू शंकर एक यूट्यूबर और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने मद्रास हाईकोर्ट में DVAC प्रमुख A. अरुण के खिलाफ CBI जांच की मांग की है।
A. अरुण पर क्या आरोप हैं?
A. अरुण पर निवारक निरोध आदेशों का दुरुपयोग करने का आरोप है, जिसे मद्रास हाईकोर्ट ने गंभीर न्यायिक निंदा के रूप में देखा है।
मद्रास हाईकोर्ट ने A. अरुण के बारे में क्या टिप्पणी की?
हाईकोर्ट ने कहा कि A. अरुण ने जानबूझकर और पूर्ण जानकारी के साथ निरोध आदेश पारित किया, और वह ऐसे आदेश जारी करने के आदी हैं।
इस मामले में CBI जांच क्यों मांगी गई?
याचिकाकर्ता का कहना है कि A. अरुण के खिलाफ स्पष्ट न्यायिक निंदा के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई, जिससे न्याय में जनता का विश्वास प्रभावित होता है।