प्रमुख तथ्य
तमिलनाडु में POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) अधिनियम के तहत 18,733 मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। यह आंकड़ा जून 2026 तक का है और इसमें 38 जिलों के आंकड़े शामिल हैं। सबसे अधिक मामले मदुरै (1,000), तिरुप्पुर (790), चेन्नई (747) और तेनकासी (702) में लंबित हैं।
विशेष अदालतों की कमी
सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में निर्देश दिया था कि जहां 100 से अधिक POCSO मामले लंबित हों, वहां विशेष अदालत स्थापित की जाए। तमिलनाडु के 37 जिलों में यह स्थिति है, लेकिन केवल 20 POCSO अदालतें हैं। 2023 में मद्रास हाई कोर्ट ने 8 नई अदालतों का प्रस्ताव भेजा, लेकिन वे अभी तक स्थापित नहीं हो सकी हैं।
सहायता सेवाओं की कमी
बाल कल्याण समिति को प्रत्येक मामले के लिए एक सहायक व्यक्ति (SP) नियुक्त करना होता है, लेकिन व्यवहार में यह नहीं होता। एक मामले में SP की देरी से नियुक्ति के कारण 24 सप्ताह की गर्भवती पीड़िता को गर्भपात के लिए देर से आदेश मिला। तत्काल राहत राशि भी शायद ही मिलती है, जिससे परिवारों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है।
कानूनी प्रक्रिया में देरी
पुलिस को 90 दिनों में आरोपपत्र दाखिल करना होता है, लेकिन अधिकांश मामलों में यह 60 दिनों में हो जाता है। हालांकि, मामलों की सुनवाई में भारी देरी होती है। 2008 में दर्ज एक बलात्कार का मामला 2026 में सूचीबद्ध हुआ, जिससे पीड़िता और उसके परिवार को पुरानी पीड़ा फिर से झेलनी पड़ी।
पीड़ितों पर प्रभाव
विशेषज्ञों के अनुसार, POCSO अधिनियम के तहत सुरक्षा और राज्य के अधिकारियों का दायित्व है कि पीड़ितों को द्वितीयक पीड़ा से बचाया जाए। लेकिन सहायता सेवाओं की कमी और प्रक्रियात्मक देरी से बच्चों को दोहरी पीड़ा झेलनी पड़ती है।
FAQ
तमिलनाडु में POCSO के कितने मामले लंबित हैं?
जून 2026 तक तमिलनाडु के 38 जिलों में 18,733 POCSO मामले लंबित हैं।
POCSO पीड़ित बच्चों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?
पीड़ित बच्चों को लंबी कानूनी प्रक्रिया, सहायक व्यक्ति की कमी, चिकित्सा रिपोर्ट न मिलना, और तत्काल राहत राशि न मिलने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
POCSO मामलों के लिए विशेष अदालतों की क्या स्थिति है?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद, 37 जिलों में 100 से अधिक मामले होने पर भी केवल 20 POCSO अदालतें हैं, और 8 नई अदालतों का प्रस्ताव अभी लागू नहीं हुआ है।