परिचय
नक्सलबाड़ी, पश्चिम बंगाल का एक छोटा सा कस्बा, जिसने भारत के सबसे लंबे चलने वाले विद्रोह को जन्म दिया। आज यहाँ वामपंथी नेताओं की लाल बलुआ पत्थर की मूर्तियाँ खड़ी हैं, लेकिन नई पीढ़ी शायद ही जानती हो कि 'नक्सलवाद' नाम इसी जगह से लिया गया है। 1967 की गर्मियों में यहाँ हुए किसान विद्रोह ने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी।
प्रमुख तथ्य
- नक्सलवाद की शुरुआत 24 मई 1967 को नक्सलबाड़ी में पुलिस कार्रवाई से हुई, लेकिन मार्च 1967 से ही किसान जमींदारों को घेरकर अनाज लूटने लगे थे।
- चारु मजुमदार और कानू सान्याल ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया।
- पहला पुलिस हताहत इंस्पेक्टर सोनम वांगड़ी थे, जिन्हें 23 मई 1967 को तीर मारकर मारा गया।
- 2006 के आंकड़ों के अनुसार, नक्सलवाद 106 जिलों तक फैल गया था।
- 30 मार्च 2026 को सरकार ने भारत को नक्सल मुक्त घोषित किया।
विस्तार से
किसान विद्रोह की कहानी
खेमू सिंह, जो उस समय 17 वर्ष के थे, आज 76 वर्ष के हैं और नक्सलबाड़ी में रहते हैं। वे बताते हैं कि कैसे कानू दा और चारू दा के भाषणों ने गाँव में आग लगा दी। "हम लाल झंडा लेकर गाँव में घूमते और 'इंकलाब जिंदाबाद' चिल्लाते। यही काफी था पूरे गाँव को जुटाने के लिए।" खेमू सिंह के अनुसार, उनके गाँव में जमींदारों से 11 हथियार मिले, जिनका उपयोग अन्य जमींदारों को भगाने और अनाज बांटने में किया गया।
जमींदारों की पीड़ा
दूसरी तरफ, झरेन रॉय (64 वर्ष) उन जमींदार परिवारों में से हैं जिन्होंने विद्रोह का खामियाजा भुगता। उनके दादा कुंदुन रॉय पहले निशाने पर थे। उनके चाचा जितेंद्र नाथ रॉय की हत्या कर दी गई और शव नदी में फेंक दिया गया। झरेन कहते हैं, "कानू दा और अन्य नेता किसानों को सशक्त बनाना चाहते थे, लेकिन जमीनी कार्यकर्ताओं ने अत्याचार किए। वे न केवल नकदी बल्कि बत्तख और मुर्गियाँ तक ले जाते थे।"
पुलिस अधिकारी का बलिदान
सोनम ग्यात्सेन वांगड़ी, जो एक वरिष्ठ नौकरशाह हैं, अपने पिता इंस्पेक्टर सोनम वांगड़ी को कभी नहीं जान पाए। 23 मई 1967 को वे निहत्थे भीड़ को शांत करने गए और चार तीर लगने से मारे गए। उन्हें मरणोपरांत राष्ट्रपति का वीरता पुरस्कार मिला। उनके बेटे कहते हैं, "मैं किसी के लिए बुरा नहीं चाहता। मैं सबको माफ करता हूँ। आंदोलन खत्म हो गया। शांति हो।"
प्रभाव और सबक
नक्सलवाद ने भारत के कई हिस्सों को प्रभावित किया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2006 से अब तक नक्सली हिंसा में लगभग 14,000 लोग मारे गए हैं। खेमू सिंह मानते हैं कि आंदोलन ने अपना रास्ता खो दिया: "बस्तर के माओवादियों का उद्देश्य सही था, लेकिन उन्होंने जनता का विश्वास खो दिया और सिर्फ बंदूक पर निर्भर रहे।" झरेन रॉय भी यही कहते हैं: "आदर्श सही थे, लेकिन हिंसा ने सब कुछ नष्ट कर दिया।"
पाठकों के लिए महत्वपूर्ण
नक्सलबाड़ी की कहानी हमें सिखाती है कि कैसे एक छोटा सा विद्रोह पूरे देश को हिला सकता है। यह आंदोलन अब समाप्त हो चुका है, लेकिन इसके सबक आज भी प्रासंगिक हैं। शांति और मेल-मिलाप ही आगे का रास्ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Naxalbari कहाँ स्थित है?
Naxalbari पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में स्थित एक कस्बा है, जो सिलीगुड़ी से लगभग तीन घंटे की दूरी पर है।
नक्सलवाद की शुरुआत कब और कैसे हुई?
नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में नक्सलबाड़ी में एक किसान विद्रोह से हुई, जिसका नेतृत्व चारु मजुमदार और कानू सान्याल ने किया। यह विद्रोह जमींदारों के शोषण के खिलाफ था और बाद में पूरे देश में फैल गया।
नक्सलवाद का अंत कब हुआ?
भारत सरकार ने 30 मार्च 2026 को देश को नक्सल मुक्त घोषित किया।
स्रोत: www.hindustantimes.com