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नागालैंड विश्वविद्यालय का अध्ययन: स्थायी कृषि में पारंपरिक ज्ञान की भूमिका

मुख्य तथ्य नागालैंड विश्वविद्यालय के एक नए अध्ययन ने अंगामी नागा समुदाय की पारंपरिक छत पर खेती (टेरेस फार्मिंग) में निहित स्थानीय ज्ञान की भूमिका को उजागर किया है। यह शोध बताता है कि कैसे…

मुख्य तथ्य

नागालैंड विश्वविद्यालय के एक नए अध्ययन ने अंगामी नागा समुदाय की पारंपरिक छत पर खेती (टेरेस फार्मिंग) में निहित स्थानीय ज्ञान की भूमिका को उजागर किया है। यह शोध बताता है कि कैसे सदियों पुरानी कृषि पद्धतियाँ आज भी पारिस्थितिकी संतुलन, सामुदायिक सहयोग और खाद्य सुरक्षा में योगदान दे रही हैं।

अध्ययन का विवरण

यह अध्ययन नागालैंड विश्वविद्यालय के ट्राइबल रिसर्च सेंटर, समाजशास्त्र विभाग में सहायक प्रोफेसर श्रीकांत यमसानी के मार्गदर्शन में डॉक्टरेट शोधार्थी केटेखोटो नेहू द्वारा किया गया। इसके निष्कर्ष सेज (Sage) जर्नल में प्रकाशित हुए हैं।

प्रमुख निष्कर्ष

  • अंगामी किसान प्राकृतिक संकेतों जैसे पौधों के खिलने का समय, पक्षियों की आदतें और कीड़ों की गतिविधियों के आधार पर बुवाई, रोपाई और कटाई करते हैं।
  • पारंपरिक मृदा और जल प्रबंधन तकनीकें पीढ़ी दर पीढ़ी विकसित हुई हैं और स्थायी कृषि सुनिश्चित करती हैं।
  • कृषि पद्धतियाँ सांस्कृतिक परंपराओं और सामुदायिक सहयोग से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

विशेषज्ञों की टिप्पणी

नागालैंड विश्वविद्यालय के कुलपति जगदीश कुमार पटनायक ने कहा, "यह अध्ययन दर्शाता है कि पारंपरिक ज्ञान किस प्रकार नागालैंड की पहाड़ी भूमि में कृषि उत्पादकता, पारिस्थितिकी संतुलन और सामुदायिक लचीलापन बनाए रखता है।" उन्होंने आगे कहा, "जब दुनिया जलवायु-लचीली कृषि समाधान तलाश रही है, ऐसे शोध स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों की प्रासंगिकता और उनके दस्तावेजीकरण के महत्व को रेखांकित करते हैं।"

प्रमुख शोधकर्ता श्रीकांत यमसानी ने बताया, "हमारे अध्ययन में पाया गया कि अंगामी नागा आबादी प्रकृति के चक्रों और संकेतों के साथ निकट सहयोग में खेती जारी रखती है।" उन्होंने यह भी कहा कि बदलते वर्षा पैटर्न और जलवायु परिवर्तनशीलता जैसी नई चुनौतियाँ किसानों के सामने हैं।

प्रभाव और महत्व

यह अध्ययन न केवल पारंपरिक कृषि के तकनीकी पहलुओं पर प्रकाश डालता है, बल्कि इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिकी आयामों को भी उजागर करता है। यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और स्थायी कृषि नीतियों के लिए मूल्यवान सबक प्रदान करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस शोध से विकास नीतियों को लागू करने में मदद मिलेगी जो स्वदेशी कृषि पद्धतियों में बाधा न डालें।

पूर्वोत्तर भारत का संदर्भ

पूर्वोत्तर भारत अपनी विविध कृषि-जलवायु क्षेत्रों और गहरी जड़ें जमाए स्वदेशी परंपराओं के लिए जाना जाता है। यह अध्ययन इस क्षेत्र की कृषि विविधता और स्थायी प्रथाओं को समझने में एक महत्वपूर्ण योगदान है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अध्ययन में किस समुदाय पर ध्यान केंद्रित किया गया?

अध्ययन नागालैंड के अंगामी नागा समुदाय की छत पर खेती की पारंपरिक पद्धतियों पर केंद्रित है।

अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष क्या हैं?

अध्ययन में पाया गया कि अंगामी किसान प्राकृतिक संकेतों जैसे पौधों के खिलने, पक्षियों की आदतों और कीड़ों के आधार पर बुवाई और कटाई करते हैं, जो पारिस्थितिकी संतुलन और सामुदायिक सहयोग को बढ़ावा देता है।

यह अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है?

यह अध्ययन दर्शाता है कि पारंपरिक ज्ञान जलवायु-लचीली कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए प्रासंगिक है, और नीति निर्माताओं को स्थायी कृषि विकास के लिए मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है।

स्रोत: www.hindustantimes.com

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