परिचय
कर्नाटक में पीढ़ियों से चली आ रही लकड़ी नक्काशी की कला अब संकट में है। चंदन की लकड़ी की बढ़ती कीमत और कम उपलब्धता के कारण कई कारीगर अपना पारंपरिक पेशा छोड़ने को मजबूर हैं। यह स्थिति न केवल कला के अस्तित्व को खतरे में डाल रही है, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका को भी प्रभावित कर रही है।
मुख्य तथ्य
- चंदन की लकड़ी की कीमत 1990 के दशक में 115 रुपये प्रति किलो थी, जो अब बढ़कर 18,000 रुपये प्रति किलो हो गई है।
- कारीगर अब शीशम और सागौन जैसी अन्य लकड़ियों का उपयोग कर रहे हैं।
- एक कारीगर को सालाना 18 किलो चंदन की आवश्यकता होती है, लेकिन सरकारी आपूर्ति घटकर 4 किलो रह गई है और अब बंद हो गई है।
कारीगरों की व्यथा
शिवमोग्गा जिले के सागरा के रहने वाले आदर्श गुडिगर बताते हैं कि उनके दादा हाथी दांत की नक्काशी करते थे, फिर चंदन पर स्विच किया और अब चंदन की कमी के कारण शीशम और सागौन का उपयोग कर रहे हैं। वे कहते हैं, "मेरे बच्चे कारीगर नहीं बनेंगे। वे उच्च शिक्षा प्राप्त करेंगे और अच्छी नौकरी करेंगे। मैं अपने परिवार का अंतिम कारीगर हूं।"
बेंगलुरु रूरल जिले के चन्नपट्टना के 70 वर्षीय कारीगर भूूपति आचार का कहना है कि 2000 के बाद से हजारों कारीगर बेरोजगार हो गए हैं। उनके अनुसार, सरकार को सालाना 18 किलो चंदन देना चाहिए, लेकिन यह घटकर 4 किलो रह गया और फिर बंद हो गया।
सरकारी प्रयास
सिरसी के कारीगर गणेश आचार सरकारी पहलों की सराहना करते हैं। कर्नाटक राज्य हस्तशिल्प विकास निगम लिमिटेड द्वारा सागरा में शिल्प गुरुकुल का नवीनीकरण किया गया है। इच्छुक लोग 10 महीने का प्रशिक्षण ले सकते हैं, जिसमें सरकार 1,500 रुपये प्रति माह छात्रवृत्ति देती है। आवेदन की आयु सीमा 16 से 35 वर्ष है।
प्रभाव और चुनौतियां
चंदन की कमी का मुख्य कारण वन क्षेत्र का कम होना है। चंदन के पेड़ को परिपक्व होने में 17 साल लगते हैं, जिससे इसकी आपूर्ति सीमित हो जाती है। कारीगरों का कहना है कि शहरों में आधुनिक संस्थानों को रॉक-कार्विंग और वुडकार्विंग में डिप्लोमा कोर्स शामिल करने चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
चंदन की लकड़ी की कमी का कारण क्या है?
वन क्षेत्र में कमी और चंदन के पेड़ों को परिपक्व होने में 17 साल लगने के कारण कमी हुई है।
सरकार कारीगरों की मदद के लिए क्या कर रही है?
शिल्प गुरुकुल में 10 महीने का प्रशिक्षण और 1,500 रुपये प्रति माह छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है।
कारीगर अब किस लकड़ी का उपयोग कर रहे हैं?
चंदन की कमी के कारण कारीगर शीशम और सागौन जैसी अन्य लकड़ियों का उपयोग कर रहे हैं।