Desh Duniya | आपराधिक मुकदमा

कर्नाटक हाईकोर्ट: सिविल विवाद में आपराधिक मामला दर्ज करना उत्पीड़न का हथियार नहीं हो सकता

प्रमुख तथ्य कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ट्रायल कोर्ट सिविल विवादों की लंबितता को नजरअंदाज नहीं कर सकते जबकि वे यह आकलन कर रहे हों कि कहीं आपराधिक मुकदमा उत्पीड़न…

प्रमुख तथ्य

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ट्रायल कोर्ट सिविल विवादों की लंबितता को नजरअंदाज नहीं कर सकते जबकि वे यह आकलन कर रहे हों कि कहीं आपराधिक मुकदमा उत्पीड़न का हथियार तो नहीं बन रहा। अदालत ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट का कर्तव्य है कि वह आरोप तय करने के चरण में भी यह जांचे कि क्या सबूत वास्तव में मजबूत संदेह और दोषसिद्धि की उचित संभावना पैदा करते हैं।

मामले का विवरण

न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने ये टिप्पणियां बेंगलुरु शहर पुलिस द्वारा दर्ज किए गए एक आपराधिक मामले को खारिज करते हुए कीं। यह मामला कई व्यक्तियों और उनके वकील के खिलाफ दर्ज किया गया था, जो दो दशक पहले पंजीकृत संपत्तियों के लेन-देन से संबंधित विवाद से उपजा था। अदालत ने कहा कि पक्षों के बीच सुलगता जमीनी विवाद कृत्रिम रूप से आपराधिक मुकदमे का रूप दे दिया गया है, जबकि इसमें आपराधिकता का कोई अंश भी नहीं है।

अदालत की टिप्पणियां

अदालत ने कहा, "आपराधिक कानून को सिविल विवाद में उत्पीड़न के हथियार में बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती।" उसने सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कानूनी रूप से ठोस सामग्री के अभाव में केवल सिविल विवाद के आधार पर नागरिकों के खिलाफ आपराधिक कानून लागू नहीं किया जा सकता।

वकीलों पर आपराधिक मामलों की बढ़ती प्रवृत्ति

अदालत ने हाल के समय में वकीलों को आपराधिक कार्यवाही में घसीटने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की। उसने कहा कि यदि हर वकील को केवल अपने मुवक्किल का प्रतिनिधित्व करने के कारण आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़े, तो इससे कानूनी पेशे पर ठंडक और पक्षाघात का प्रभाव पड़ेगा। अदालत ने कहा, "कानूनी पेशे की गरिमा को असंतुष्ट वादियों द्वारा बार के सदस्यों के खिलाफ आपराधिक कानून को धमकी के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।"

आपराधिक न्याय प्रणाली के दो फिल्टर

अदालत ने कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली को दो फिल्टरों के माध्यम से काम करना चाहिए: पहला, जांच और आरोपपत्र दाखिल करने के चरण में, और दूसरा, ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय करने के चरण में। दोनों चरणों में, कानून ट्रायल कोर्ट को ऐसी कार्यवाही को समाप्त करने की पर्याप्त शक्ति देता है जो प्रक्रिया का दुरुपयोग हो, बशर्ते प्रत्येक मामले के विशिष्ट तथ्यों को ध्यान में रखा जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट आपराधिक कार्यवाही शुरू होने से पहले सिविल विवाद की लंबितता को नजरअंदाज नहीं कर सकता।

FAQ

कर्नाटक हाईकोर्ट ने क्या कहा है?

हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल विवादों में आपराधिक मुकदमा चलाना उत्पीड़न का हथियार नहीं हो सकता। ट्रायल कोर्ट को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आपराधिक कार्यवाही का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए न हो।

अदालत ने वकीलों के खिलाफ आपराधिक मामलों पर क्या टिप्पणी की?

अदालत ने कहा कि वकीलों को सिर्फ अपने पेशेवर कर्तव्यों का पालन करने पर आपराधिक मामलों में फंसाना गलत है। इससे कानूनी पेशे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

इस फैसले का क्या प्रभाव होगा?

इस फैसले से सिविल विवादों में आपराधिक मामलों के दुरुपयोग पर रोक लगेगी और वकीलों को अनुचित आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा मिलेगी।

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