मुख्य बिंदु
पूर्व विदेश सचिव और 'चाइना वार्स' के लेखक राजदूत विजय गोखले ने शनिवार को चेन्नई में एक कार्यक्रम में कहा कि भारत का अमेरिका की ओर झुकाव तब तक गलत नहीं है जब तक वह उचित और लाभदायक हो। यह बात उन्होंने तमिलनाडु सरकार के संगीत सभागार, टैगोर ऑडिटोरियम में चेन्नई इंटरनेशनल सेंटर द्वारा आयोजित एक संवाद में कही।
विस्तार से जानकारी
संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व स्थायी प्रतिनिधि टी.एस. तिरुमूर्ति के साथ बातचीत में गोखले ने कहा कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कभी नहीं कहा कि गुटनिरपेक्षता का अर्थ 'किसी भी पक्ष का न लेना' है।
गोखले ने कहा, 'मेरा मानना है कि अंततः यदि झुकना ही है, तो वह अमेरिका की ओर होना चाहिए, क्योंकि हमारी मूल्य प्रणाली चीन की तुलना में निश्चित रूप से अधिक अनुकूल है। दूसरा, यदि कोई दोनों में से एक है जो आपके साथ प्रौद्योगिकी और जानकारी साझा करेगा, तो वह बीजिंग नहीं बल्कि वाशिंगटन होगा। लेकिन हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि चीन के साथ एक सूक्ष्म नीति अपनानी होगी। वह दुनिया की दूसरी सबसे शक्तिशाली देश है, शायद सबसे शक्तिशाली, और हमें उन्हें पकड़ने में लंबा समय लगेगा, और वे हमारे पड़ोसी हैं।'
गलवान संघर्ष का प्रभाव
गोखले ने कहा कि गलवान संघर्ष ने भारत-चीन संबंधों के ढांचे को 'पूरी तरह से ध्वस्त' कर दिया, जिसके तीन स्तंभ टूट गए:
- पहला स्तंभ: भारत सीमा वार्ता और अन्य द्विपक्षीय संबंधों को समानांतर रूप से आगे बढ़ाएगा, जो एक-दूसरे को प्रभावित नहीं करेंगे। गलवान ने इसे नष्ट कर दिया क्योंकि इसने हर क्षेत्र में द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित किया।
- दूसरा स्तंभ: चीनी आश्वासन कि सीमा तय होने तक सैन्य दबाव नहीं डाला जाएगा। चीन ने पिछले 10 वर्षों में लगातार ऐसा किया है।
- तीसरा स्तंभ: दोनों प्रमुख शक्तियों के लिए इंडो-पैसिफिक में पर्याप्त स्थान। गोखले को संदेह है कि चीन भारत को समान नहीं मानता और उसके विकास को नहीं चाहता।
चीन की आर्थिक स्थिति और वैश्विक भूमिका
ईरान युद्ध पर चर्चा करते हुए गोखले ने कहा कि चीन भी भारत की तरह आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहा है। उन्होंने कहा, 'आप दुकानों या रेस्तरां में खर्च में कमी और संपत्ति में गिरावट देख सकते हैं। घटती जनसंख्या के कारण यह लाभदायक नहीं रह गया है।' उन्होंने पश्चिमी विद्वानों के इस दावे को गलत बताया कि चीन की निष्क्रियता के बावजूद अमेरिका एकध्रुवीय शक्ति बना हुआ है।
गोखले ने कहा कि चीन अमेरिका की तरह आक्रमण करके नहीं, बल्कि अधिक सूक्ष्म आधिपत्य का प्रयोग करता है। 'चीन का आधिपत्य एक सहायक संबंध है। बेल्ट एंड रोड पहल देखिए: मैं आपको 5 अरब, 15 अरब, 10 अरब, 8 अरब डॉलर दे रहा हूं। आप वही करें जो मैं कहूं और मेरे हितों को स्वीकार करें - यही चीनी आधिपत्य है।'
पाठकों के लिए महत्वपूर्ण
यह चर्चा भारत की विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ को दर्शाती है, जहां अमेरिका के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी जा रही है, लेकिन चीन के साथ व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। गलवान के बाद संबंधों में आई दरार ने नई रणनीतिक सोच को जन्म दिया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भारत को अमेरिका की ओर झुकना चाहिए या चीन की ओर?
पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले के अनुसार, भारत को अमेरिका की ओर झुकना चाहिए क्योंकि मूल्य प्रणाली अधिक अनुकूल है और प्रौद्योगिकी साझा करने की संभावना अधिक है। हालांकि, चीन के साथ संतुलित नीति अपनानी होगी।
गलवान संघर्ष ने भारत-चीन संबंधों को कैसे प्रभावित किया?
गोखले ने कहा कि गलवान संघर्ष ने भारत-चीन संबंधों के तीन स्तंभों को ध्वस्त कर दिया: सीमा वार्ता और द्विपक्षीय संबंधों को अलग रखना, सैन्य दबाव न डालने का आश्वासन, और दोनों शक्तियों के लिए पर्याप्त स्थान।
चीन की आर्थिक स्थिति पर गोखले ने क्या कहा?
गोखले ने कहा कि चीन आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है, जिसमें खर्च और संपत्ति में गिरावट देखी जा रही है। उन्होंने पश्चिमी विद्वानों के इस दावे को गलत बताया कि अमेरिका एकध्रुवीय शक्ति बना हुआ है।
स्रोत: www.thehindu.com