मुख्य तथ्य
अफ्रीकी संघ (AU) में भारत के पूर्व राजदूत गुरजीत सिंह ने कहा है कि भारत ने अफ्रीकी संघ के साथ संबंधों को मजबूत करने का अवसर गंवा दिया। उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक में भारत ने अफ्रीका में द्विपक्षीय सरकारी स्तर के आदान-प्रदान को प्राथमिकता दी, जिससे अफ्रीकी संघ के साथ संबंध कमजोर हुए।
विस्तार से जानकारी
चौथा भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन, जो 31 मई को होने वाला था, इबोला प्रकोप के कारण रद्द कर दिया गया। इससे पहले तीसरा शिखर सम्मेलन 2014 में एक साल की देरी के बाद 2015 में आयोजित हुआ था, जिसमें सभी 54 अफ्रीकी देशों ने भाग लिया था, जिनमें 41 राष्ट्राध्यक्ष शामिल थे। राजदूत सिंह ने कहा कि 2015 के बाद भारत ने द्विपक्षीय संबंधों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया और क्षेत्रीय आर्थिक समुदायों तथा अफ्रीकी संघ के साथ जुड़ाव कम कर दिया, जो पहले दो शिखर सम्मेलनों के दौरान बनाई गई त्रिस्तरीय संरचना का हिस्सा थे।
हालांकि भारत ने 2023 में अपनी G20 अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य के रूप में शामिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन तब तक अफ्रीकी संघ का कैलेंडर अन्य नए साझेदारों से भर चुका था। राजदूत सिंह ने कहा, 'भारत ने स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यवसाय और ऊर्जा पर मंत्री स्तर के शिखर सम्मेलन आयोजित किए थे, लेकिन हमने उन्हें बंद कर दिया। ये व्यवस्थाएं कार्यात्मक और मूल्यवान थीं और इन्हें जारी रहना चाहिए था।'
प्रभाव और विश्लेषण
राजदूत सिंह ने भारत की अफ्रीका नीति की तुलना चीन से करने से आगाह किया। उन्होंने कहा, 'मैं इसे भारत बनाम चीन के रूप में नहीं देखता। मेरा दृष्टिकोण हमेशा यह रहा: हम किस लिए अच्छे हैं, हम क्या पेशकश कर सकते हैं, चलो वह करें।' उन्होंने बताया कि चीनी मॉडल निष्कर्षणात्मक है, जबकि भारतीय मॉडल सहकारी है। भारत मानव संसाधन विकास, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और एसएमई निवेश पर ध्यान केंद्रित करता है। उनके अनुसार, 'भारतीय मॉडल इस हद तक सफल रहा है कि आज G7 देश अफ्रीका में त्रिपक्षीय सहयोग के लिए भारत के साथ काम करना चाहते हैं।'
अफ्रीकी नेता और सरकारें इस अंतर को पहचानती हैं। वे कहते थे: 'चीन अधिक करता है, लेकिन भारत बेहतर करता है।'
पाठकों के लिए महत्वपूर्ण बातें
राजदूत सिंह ने भारत-अफ्रीका संबंधों के भविष्य के लिए कई सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि भारत की ताकत लंबे समय से चले आ रहे लोगों से लोगों के संबंधों, प्रवासी भारतीयों, लघु और मध्यम उद्यमों तथा शैक्षिक और विकास साझेदारियों में निहित है। संयुक्त परियोजनाओं पर उन्होंने कहा, 'हमें अपने परियोजना मॉडल को बदलने की जरूरत है। कई पिछली पहलें विफल रहीं क्योंकि भारत ने उन्हें पूरी तरह से वित्तपोषित किया और मेजबान देश में स्वामित्व की भावना नहीं थी। जब तक मेजबान देश वित्तपोषण प्रदान न करे, तब तक मत जाइए। पहले वह प्रतिबद्धता प्राप्त करें, फिर उनका पूरा समर्थन करें। ज़ांज़ीबार में आईआईटी मद्रास पहले से ही इस सिद्धांत पर बनाया गया है: स्थानीय वित्तपोषण, भारतीय सॉफ्ट पावर।'
राजदूत सिंह के अनुसार, अब यह मायने नहीं रखता कि भारत और अफ्रीका ने गुटनिरपेक्षता, उपनिवेशवाद मुक्ति और आतंकवाद के खिलाफ एक साथ लड़ाई लड़ी। 'अफ्रीका आज लेन-देन पर आधारित है। जो मायने रखता है वह सरल है: आपका मेरे साथ आखिरी जुड़ाव कितना अच्छा था?'
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- भारत ने अफ्रीकी संघ के साथ संबंधों में कहां गलती की? पूर्व राजदूत गुरजीत सिंह के अनुसार, भारत ने 2015 के बाद द्विपक्षीय संबंधों पर अधिक ध्यान दिया और अफ्रीकी संघ तथा क्षेत्रीय आर्थिक समुदायों के साथ जुड़ाव कम कर दिया, जिससे बहुपक्षीय सहयोग प्रभावित हुआ।
- भारत और चीन का अफ्रीका में क्या दृष्टिकोण है? गुरजीत सिंह के अनुसार, चीन का मॉडल निष्कर्षणात्मक है जबकि भारत का मॉडल सहकारी है, जो मानव संसाधन विकास और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर केंद्रित है।
- भारत-अफ्रीका संबंधों के भविष्य के लिए क्या सुझाव हैं? पूर्व राजदूत का सुझाव है कि भारत को परियोजनाओं में मेजबान देश की भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए और स्थानीय वित्तपोषण पर जोर देना चाहिए, जैसा कि ज़ांज़ीबार में आईआईटी मद्रास के मॉडल में देखा गया।