Desh Duniya | 3D कंक्रीट प्रिंटिंग

सरकार का प्लान: pmay-u के तहत 3d कंक्रीट प्रिंटिंग से बनेंगे 20-20 घरों के क्लस्टर

प्रमुख तथ्य केंद्र सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी (PMAY-U) 2.0 के तहत 3D कंक्रीट प्रिंटिंग तकनीक (3DCPT) का उपयोग करते हुए तीन प्रदर्शन आवास परियोजनाएं शुरू करने की योजना बना रही है। प्रत्येक परियोजना में लगभग…

प्रमुख तथ्य

केंद्र सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी (PMAY-U) 2.0 के तहत 3D कंक्रीट प्रिंटिंग तकनीक (3DCPT) का उपयोग करते हुए तीन प्रदर्शन आवास परियोजनाएं शुरू करने की योजना बना रही है। प्रत्येक परियोजना में लगभग 20 घरों का क्लस्टर होगा। ये परियोजनाएं गोवा, नागपुर और तिरुवनंतपुरम में प्रस्तावित हैं, जो शहरी सार्वजनिक आवास क्षेत्र में 3D कंक्रीट प्रिंटिंग का पहला उपयोग होगा।

परियोजना का विवरण

ये पायलट प्रोजेक्ट PMAY-U के डेमॉन्स्ट्रेशन हाउसिंग प्रोजेक्ट (DHP) घटक के तहत लिए जाएंगे, जो नवीन, टिकाऊ और आपदा-रोधी निर्माण तकनीकों को बढ़ावा देता है। इस योजना के तहत, केंद्र नई तकनीकों को अपनाने की अतिरिक्त लागत की भरपाई के लिए अनुदान प्रदान करता है, जबकि राज्य सरकारें भूमि उपलब्ध कराती हैं।

आवास की कमी और इसका प्रभाव

यह कदम बढ़ती आवास कमी के बीच उठाया गया है। UN-Habitat की विश्व शहर रिपोर्ट 2026 के अनुसार, भारत में शहरी बेघरता दर 13 प्रति 10,000 लोग है, जबकि नई आपूर्ति में किफायती आवास का हिस्सा 2018 में 52% से घटकर 2025 में 17% रह गया है। Knight Frank और NAREDCO की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक भारत का आवास घाटा 30 मिलियन यूनिट से अधिक हो सकता है।

भारत में 3D प्रिंटिंग का प्रयोग

भारत ने पिछले पांच वर्षों में 3D-प्रिंटेड निर्माण के साथ प्रयोग किए हैं। 2021 में, IIT मद्रास द्वारा इनक्यूबेटेड स्टार्टअप Tvasta ने देश का पहला 3D-प्रिंटेड घर बनाया। 2023 में, लार्सन एंड टुब्रो ने IIT मद्रास के सहयोग से बेंगलुरु में एक 3D-प्रिंटेड डाकघर 43 दिनों में पूरा किया। अक्टूबर 2025 में, CSIR-CBRI ने PMAY-ग्रामीण के तहत भारत का पहला 3D कंक्रीट-प्रिंटेड ग्रामीण घर बनाया।

लागत और सीमाएं

लागत एक बड़ी बाधा बनी हुई है। एक वरिष्ठ आवास मंत्रालय के अधिकारी के अनुसार, “3D-प्रिंटेड निर्माण की लागत वर्तमान में लगभग ₹4,000 प्रति वर्ग फुट है, जबकि पारंपरिक निर्माण में यह लगभग ₹2,000 प्रति वर्ग फुट है।” पायलट प्रोजेक्ट यह आकलन करने के लिए हैं कि क्या यह तकनीक बड़े पैमाने पर किफायती हो सकती है। एक और सीमा यह है कि यह तकनीक ऊंची इमारतों का समर्थन नहीं कर सकती। फिलहाल केवल G+1 संरचनाएं ही बनाई जा सकती हैं।

विशेषज्ञों की राय

IIT मद्रास के प्रोफेसर रवींद्र गेट्टू ने कहा कि फिलहाल यह तकनीक प्रीमियम या प्रायोगिक परियोजनाओं के लिए अधिक उपयुक्त है। वहीं, CSIR-CBRI के मुख्य वैज्ञानिक अजय चौरसिया ने बताया कि रुड़की परियोजना में सीमेंट की जगह फ्लाई ऐश और गन्ने की खोई जैसे अपशिष्ट पदार्थों का उपयोग किया गया, जिससे लागत और कार्बन फुटप्रिंट दोनों कम हुए। उन्होंने कहा कि यह तकनीक ग्रामीण आवास कार्यक्रमों के लिए अधिक उपयुक्त है।

नियामक चुनौतियां

CSTEP की वरिष्ठ विश्लेषक दिव्या डेविस ने कहा कि भारत में 3D-प्रिंटेड इमारतों के लिए कोई समर्पित नियामक ढांचा नहीं है। “वर्तमान में 3D-प्रिंटेड इमारतों के लिए कोई राष्ट्रीय मानक या गुणवत्ता नियंत्रण प्रोटोकॉल मौजूद नहीं हैं।” राष्ट्रीय भवन संहिता और भारतीय मानकों में मौजूदा प्रावधान प्रिंटेड संरचनाओं की विशिष्टताओं को पूरी तरह से संबोधित नहीं करते हैं।

वैश्विक परिदृश्य

दुनिया भर में सरकारें निर्माण में 3D प्रिंटिंग को अपना रही हैं। दुबई ने 2030 तक सभी नई इमारतों में 25% 3D-प्रिंटिंग तकनीक का उपयोग अनिवार्य कर दिया है। विश्व बैंक की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, यह तकनीक निर्माण लागत और समय को लगभग 15% तक कम कर सकती है।

FAQ

  • 3D कंक्रीट प्रिंटिंग तकनीक से घर बनाने की लागत कितनी है? वर्तमान में 3D प्रिंटेड निर्माण की लागत लगभग ₹4,000 प्रति वर्ग फुट है, जबकि पारंपरिक निर्माण में यह लगभग ₹2,000 प्रति वर्ग फुट है।
  • क्या 3D प्रिंटिंग तकनीक से ऊंची इमारतें बनाई जा सकती हैं? फिलहाल इस तकनीक से केवल G+1 संरचनाएं ही बनाई जा सकती हैं, जो बड़े शहरों में वर्टिकल हाउसिंग के लिए सीमित है।
  • क्या 3D प्रिंटेड इमारतों के लिए भारत में कोई मानक हैं? अभी तक 3D प्रिंटेड इमारतों के लिए कोई राष्ट्रीय मानक या गुणवत्ता नियंत्रण प्रोटोकॉल मौजूद नहीं हैं।
  • 3D कंक्रीट प्रिंटिंग से पर्यावरण को क्या लाभ है? इस तकनीक में फ्लाई ऐश और गन्ने की खोई जैसे औद्योगिक-कृषि अपशिष्ट पदार्थों का उपयोग करके सीमेंट की खपत कम की जा सकती है, जिससे कार्बन फुटप्रिंट घटता है।
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