Desh Duniya | आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम

केंद्र ने एसिड अटैक पीड़ितों की परिभाषा में किया संशोधन, आंतरिक चोटें भी शामिल

मुख्य तथ्य केंद्र सरकार ने मंगलवार, 14 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में बताया कि उसने वर्ष 2016 के दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम (RPwD Act) में संशोधन किया है। इस संशोधन के तहत एसिड…

मुख्य तथ्य

केंद्र सरकार ने मंगलवार, 14 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में बताया कि उसने वर्ष 2016 के दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम (RPwD Act) में संशोधन किया है। इस संशोधन के तहत एसिड अटैक पीड़ितों की परिभाषा का विस्तार किया गया है, जिसमें अब एसिड या समान संक्षारक पदार्थ निगलने से हुई आंतरिक चोटों को भी शामिल किया गया है।

संशोधन का विवरण

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष बताया कि 22 मई 2026 को एक अधिसूचना जारी की गई थी। इस अधिसूचना के अनुसार, एसिड अटैक पीड़ित को अब 'हिंसक हमले, स्वयं-चोट, एसिड या समान संक्षारक पदार्थ फेंकने, देने, डालने या गिराने से बाहरी या आंतरिक रूप से विकृत' व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है।

यह संशोधन पूर्व प्रभावी (रेट्रोस्पेक्टिव) होगा, जिससे 22 मई 2026 से पहले हुई आंतरिक चोटों वाले पीड़ित भी 2016 के अधिनियम के तहत लाभ का दावा कर सकेंगे।

पृष्ठभूमि और न्यायिक हस्तक्षेप

2016 का कानून पहले केवल एसिड फेंकने के पीड़ितों को मान्यता देता था, जबरन एसिड पिलाने को नहीं। हालांकि, भारतीय न्याय संहिता (BNS) ने एसिड फेंकने और एसिड पिलाने दोनों को अपराध माना था, जिसमें 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है।

मई 2026 में, सुप्रीम कोर्ट ने अपनी व्यापक शक्तियों (अनुच्छेद 142) का उपयोग करते हुए जबरन एसिड पिलाने से बचे लोगों को 'एसिड अटैक पीड़ित' की श्रेणी में शामिल किया था। यह कदम वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी की दलील के बाद उठाया गया, जिन्होंने कहा था कि 'जिन्होंने जबरन एसिड निगलने की अत्यधिक पीड़ा सही है, उन्हें बाहर नहीं छोड़ा जाना चाहिए।'

सरकार और न्यायालय का रुख

पिछली सुनवाई में, न्यायालय ने केंद्र को दंडात्मक और जमानत कानूनों में बदलाव का संकेत दिया था ताकि इस 'सबसे क्रूर और जघन्य' अपराध के दोषियों को सजा मिल सके। केंद्र ने भी ऐसे कृत्यों की निंदा करते हुए इसे 'पशु प्रवृत्ति' का परिणाम बताया था। न्यायालय ने पीड़ितों के संरक्षण के लिए एक व्यापक नीति ढांचा तैयार करने का सुझाव दिया था, क्योंकि बचने वालों को दीर्घकालिक और सतत चिकित्सा उपचार की आवश्यकता होती है।

पीड़ितों पर प्रभाव

इस संशोधन से उन पीड़ितों को राहत मिलेगी जिन्हें जबरन एसिड पिलाया गया और जिनके आंतरिक अंग क्षतिग्रस्त हुए। अब वे दिव्यांगता लाभ, चिकित्सा सहायता और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के पात्र होंगे।

पाठकों के लिए महत्वपूर्ण

  • यह संशोधन 22 मई 2026 से पूर्व प्रभावी है, इसलिए पुराने मामलों के पीड़ित भी आवेदन कर सकते हैं।
  • पीड़ितों को अपनी आंतरिक चोटों के चिकित्सा प्रमाणपत्र रखने चाहिए।
  • अधिक जानकारी के लिए सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की वेबसाइट देखी जा सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एसिड अटैक पीड़ितों की परिभाषा में क्या बदलाव किया गया है?

अब एसिड अटैक पीड़ितों में वे लोग भी शामिल होंगे जिन्हें जबरन एसिड पिलाया गया है, जिससे आंतरिक चोटें आई हैं। पहले केवल बाहरी चोटों वाले पीड़ितों को ही मान्यता थी।

यह संशोधन कब से लागू होगा?

यह संशोधन 22 मई 2026 से पूर्व प्रभावी (रेट्रोस्पेक्टिव) होगा, यानी इस तिथि से पहले हुई आंतरिक चोटों वाले पीड़ित भी लाभ ले सकेंगे।

इस संशोधन का क्या महत्व है?

इससे जबरन एसिड पिलाए जाने के पीड़ितों को आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम के तहत दिव्यांगता लाभ और सुरक्षा मिलेगी, जो पहले संभव नहीं था।

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