Desh Duniya | क्रिथी करंथ

जैव विविधता संकट: निकोबार में वनों की कटाई की आलोचना, केंद्र सरकार पर निशाना

मुख्य तथ्य बेंगलुरु में 5 जून, 2026 को आयोजित ‘द हिंदू हडल’ कार्यक्रम में कांग्रेस सांसद और राज्यसभा सदस्य जयराम रमेश ने निकोबार द्वीपसमूह में वनों की कटाई की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि…

मुख्य तथ्य

बेंगलुरु में 5 जून, 2026 को आयोजित 'द हिंदू हडल' कार्यक्रम में कांग्रेस सांसद और राज्यसभा सदस्य जयराम रमेश ने निकोबार द्वीपसमूह में वनों की कटाई की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि निकोबार में वनों को साफ करके हरियाणा में मुआवजा वनीकरण करना एक बोगस तर्क है। इस सत्र में सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज की सीईओ क्रिथी करंथ और एनडीटीवी की कंसल्टिंग एडिटर गार्गी रावत भी शामिल थीं।

विस्तार से जानकारी

जयराम रमेश ने कहा कि निकोबार एक अनोखा जैव विविधता क्षेत्र है और पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री के रूप में उन्होंने सरकार को उन वन क्षेत्रों को साफ करने की अनुमति देने के लिए आलोचना की जिन्हें कभी नहीं काटा जाना चाहिए था। उन्होंने चेतावनी दी कि मध्य भारत के बड़े हिस्से, जो देश का समृद्ध वन कटोरा हैं, खतरे में हैं। ओडिशा, झारखंड, मध्य प्रदेश और निकोबार में ज्ञात और अज्ञात जैव विविधता का नुकसान हो रहा है।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का अर्थ है छोटे से छोटे की रक्षा करना। यदि कोई समुदाय कहता है कि कोई चीज उनकी संस्कृति का अभिन्न अंग है, तो हमारा कर्तव्य है कि उस संस्कृति की रक्षा करें। भारत में प्रकृति की रक्षा का अर्थ संस्कृति की रक्षा भी है।

हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि सरकारों को रोजगार सृजन और निवेश आकर्षित करने की मजबूरियां हैं। उन्होंने कहा कि पर्यावरण और विकास के बीच व्यापार-बंद एक लोकतांत्रिक, दे-ले प्रक्रिया होनी चाहिए। उन्होंने कहा, 'पर्यावरण और विकास में आप सभी पक्षों को संतुष्ट नहीं कर सकते। एकमात्र नीति जो काम करती है वह है संतुलित असंतोष।'

उन्होंने आगे कहा कि साथ-साथ चलने का मतलब कठिन विकल्प चुनना है। कुछ स्थितियों में विकास को चुनना होगा क्योंकि इसमें नौकरियां, निवेश और संगठन शामिल हैं। लेकिन कुछ उदाहरणों में कहना होगा, 'नहीं, हम किसी भी कीमत पर पर्यावरण की रक्षा करेंगे।'

प्रभाव और विशेषज्ञ राय

क्रिथी करंथ ने चिंता जताई कि भारतीय अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास का जश्न मनाते हैं, लेकिन वन्यजीवों का नहीं, जबकि भारत दुनिया के 17 मेगा-जैव विविधता वाले देशों में से एक है। उन्होंने कहा, 'हम भूल रहे हैं कि हम कमरे में अकेले भारतीय नहीं हैं। बाघ, हाथी, हॉर्नबिल, नारकोंडम हॉर्नबिल जो निकोबार द्वीपों से गायब होने वाला है, और असंख्य उभयचर, तितलियां और कीट अभी खोजे जाने बाकी हैं।'

उन्होंने बताया कि भारत के कई हिस्सों में वन्यजीवों की संख्या बढ़ी है, लेकिन बड़े क्षेत्र गहरे संकट में हैं। उन्होंने चेतावनी दी, 'ग्रेट इंडियन बस्टर्ड हमारी पीढ़ी में ही विलुप्त हो जाएगा। दक्कन के पठार पर फैले इन विशाल पक्षियों की संख्या 50 से भी कम रह गई है।'

मानव-पशु संघर्ष के बारे में करंथ ने कहा कि समाधान विज्ञान और डेटा पर आधारित होने चाहिए और इसमें गहरी स्थानीय सामुदायिक भागीदारी की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, 'अब हमारे पास जानवरों का उच्च घनत्व है, लेकिन ग्रामीण भारत में वन्यजीवों के लिए बड़ी सांस्कृतिक और सामाजिक समस्याएं हैं। शहरी भारतीय बाघ और हाथियों के लिए निर्णय नहीं लेते, ग्रामीण भारतीय लेते हैं। हमें ग्रामीण भारतीयों को संघर्ष सुलझाने के लिए सशक्त बनाना होगा।'

पाठकों के लिए महत्वपूर्ण बातें

  • निकोबार में वनों की कटाई से अनोखी प्रजातियां खतरे में हैं, और मुआवजा वनीकरण पर्याप्त नहीं है।
  • ग्रेट इंडियन बस्टर्ड विलुप्ति के कगार पर है, केवल 50 से कम बचे हैं।
  • पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया और कठिन विकल्प जरूरी हैं।
  • मानव-पशु संघर्ष के समाधान में स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाना महत्वपूर्ण है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

निकोबार द्वीपसमूह में जैव विविधता को क्या खतरा है?

निकोबार में वनों की कटाई और विकास परियोजनाओं से अनोखी प्रजातियां जैसे नारकोंडम हॉर्नबिल खतरे में हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मुआवजा वनीकरण जैसे उपाय पर्याप्त नहीं हैं।

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की वर्तमान स्थिति क्या है?

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की संख्या 50 से भी कम रह गई है और यह हमारी पीढ़ी में ही विलुप्त हो सकता है। यह पक्षी मुख्यतः दक्कन के पठार पर पाया जाता है।

जयराम रमेश ने पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन पर क्या कहा?

उन्होंने कहा कि पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन बनाना मुश्किल है और 'संतुलित असंतोष' ही एकमात्र नीति है जो काम करती है। कभी विकास को प्राथमिकता देनी पड़ती है तो कभी पर्यावरण की रक्षा करनी पड़ती है।

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