सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (11 जून, 2026) को इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव और वरिष्ठ IAS अधिकारी संजय प्रसाद के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां की गई थीं। हाईकोर्ट ने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को निर्देश दिया था कि वह मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति (ACC) के समक्ष संजय प्रसाद की भविष्य की नियुक्तियों के लिए उपयुक्तता की जांच करे।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने संजय प्रसाद की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया। पीठ ने कहा, "नोटिस जारी करें, 10 सप्ताह में वापसी योग्य। तब तक, हाईकोर्ट द्वारा विवादित आदेश के तहत जारी निर्देशों पर रोक रहेगी।"
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला झांसी निवासी मेघा रायकवार की याचिका से जुड़ा है, जिन्होंने अपनी 15 वर्षीय बेटी को कथित अवैध हिरासत से मुक्त कराने की मांग की थी। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बताया गया कि प्राथमिकी दर्ज कर आरोपपत्र दाखिल कर दिया गया था, लेकिन याचिकाकर्ता का आरोप था कि जांच में "असली" आरोपियों की पहचान नहीं हुई और आरोपपत्र मुख्यतः आरोपियों के बयानों पर आधारित था।
हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपपत्र उसके पूर्व निर्णय में दिए गए दिशानिर्देशों के अनुपालन में नहीं था, जिसमें आपराधिक जांच को निष्पक्ष और कानूनी रूप से टिकाऊ बनाने के लिए विस्तृत दिशानिर्देश दिए गए थे। इसके बाद अदालत ने गृह विभाग से स्पष्टीकरण मांगा।
राज्य सरकार का रुख
अपने हलफनामे में राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि वह उस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का इरादा रखती है और अनुरोध किया कि प्रस्तावित अपील दायर होने तक कोई प्रतिकूल आदेश न पारित किया जाए। अदालत ने मामला स्थगित कर दिया, लेकिन तीन महीने से अधिक समय बीत जाने और उस निर्णय को एक वर्ष से अधिक समय हो जाने के बाद भी राज्य ने सुप्रीम कोर्ट का रुख नहीं किया।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने इस देरी पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि प्रस्तावित अपील का उपयोग अदालत के निर्देशों के कार्यान्वयन में निष्क्रियता को सही ठहराने के लिए किया जा रहा है।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां और निर्देश
अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल सेवकों को दी गई "बेलगाम" और "अनियंत्रित" विवेकाधीन शक्तियां कानून के शासन को कमजोर करती हैं और लोक प्रशासन में जवाबदेही को क्षीण करती हैं। अदालत ने कहा, "वरिष्ठ अधिकारियों को अपने अधीनस्थों के आचरण और प्रदर्शन के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, क्योंकि सार्वजनिक सेवाओं के प्रभावी वितरण को सुनिश्चित करना उनकी पेशेवर और प्रशासनिक जिम्मेदारी है।"
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यह जिम्मेदारी आपराधिक दायित्व तक भी विस्तारित हो सकती है, जहां अधीनस्थों द्वारा कदाचार को रोकने या उस पर कार्रवाई करने में विफलता के परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी या कानूनी आदेशों की अवमानना जैसे अपराध होते हैं।
अदालत ने DoPT को सिफारिश की कि वह वरिष्ठ अधिकारियों को अधीनस्थों के कदाचार को रोकने या उस पर कार्रवाई करने में विफल रहने पर जवाबदेह ठहराने के लिए "वरिष्ठ जिम्मेदारी" का सिद्धांत विकसित करे। साथ ही, मामले को ACC के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया ताकि संजय प्रसाद की भविष्य की नियुक्तियों के लिए उपयुक्तता की जांच की जा सके।
संजय प्रसाद की याचिका
अपनी याचिका में संजय प्रसाद ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट याचिका में मांगी गई राहत से परे चला गया और बिना किसी आधार या औचित्य के उनके खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां कीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी।
FAQ
सुप्रीम कोर्ट ने किस आदेश पर रोक लगाई?
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाई जिसमें वरिष्ठ IAS अधिकारी संजय प्रसाद के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां की गई थीं और DoPT को उनकी उपयुक्तता की जांच करने का निर्देश दिया गया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या निर्देश दिए थे?
हाईकोर्ट ने DoPT को 'वरिष्ठ जिम्मेदारी' का सिद्धांत विकसित करने और मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति के समक्ष संजय प्रसाद की उपयुक्तता की जांच करने का निर्देश दिया था।
संजय प्रसाद ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी?
संजय प्रसाद ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने राहत की मांग से परे जाकर बिना किसी आधार के उनके खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां कीं।