मुख्य तथ्य
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी जिसमें विधायकों को नगर निगमों और नगर पंचायतों के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष चुनाव में पदेन सदस्य के रूप में मतदान से वंचित कर दिया गया था। यह आदेश 4 जून 2026 को हाईकोर्ट द्वारा पारित किया गया था।
मामले का विवरण
हिमाचल प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। सरकार का कहना था कि यह आदेश उन याचिकाओं पर आया है जो हिमाचल प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1994 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती हैं और अभी लंबित हैं। सरकार ने तर्क दिया कि इस आदेश ने चुनाव प्रक्रिया के बीच में विधायकों के मतदान के अधिकार को छीन लिया।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश पर नाराजगी जताते हुए कहा, 'अधिनियम में जो प्रावधान नहीं है, वह अदालत न्यायिक आदेश से कैसे प्रदान कर सकती है?' पीठ ने स्पष्ट किया कि विधायकों द्वारा डाले गए वोट हाईकोर्ट में लंबित कार्यवाही के परिणाम के अधीन होंगे।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान और अतिरिक्त महाधिवक्ता वैभव श्रीवास्तव ने पेश हुए। दीवान ने बताया कि 1994 अधिनियम में 2000 में संशोधन कर विधायकों को शहरी स्थानीय निकायों के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष चुनाव में पदेन सदस्य के रूप में मतदान का अधिकार दिया गया था।
दीवान ने कहा कि हाईकोर्ट ने हिमाचल प्रदेश निर्वाचन नियम, 2015 का हवाला देते हुए कहा कि अध्यक्ष-उपाध्यक्ष का चुनाव केवल निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मतदान का अधिकार केवल निर्वाचित और पदेन सदस्यों (विधायकों) को है, नामांकित सदस्यों को नहीं। नामांकित सदस्य केवल कार्यवाही में भाग ले सकते हैं और चर्चा में हिस्सा ले सकते हैं।
राज्य ने बताया कि 2000 के संशोधन और 2015 के नियमों के बीच संभावित विरोध को देखते हुए एक स्पष्टीकरण जारी किया गया था, जिसमें दोहराया गया कि विधायकों को नगर निगमों और नगर पंचायतों के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष चुनाव में मतदान का अधिकार है।
याचिकाकर्ताओं का पक्ष
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने इस स्पष्टीकरण और 2000 के संशोधन को चुनौती दी थी। उन्होंने हाईकोर्ट में एक अंतरिम आवेदन दायर कर धारा 10(3) के संचालन पर रोक लगाने की मांग की थी, जो विधायकों को अध्यक्ष-उपाध्यक्ष चुनने में भागीदारी का अधिकार देती है। यह आवेदन चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद दायर किया गया था।
प्रभाव
यह मामला हिमाचल प्रदेश की लगभग 49 नगर निगमों और नगर पंचायतों से संबंधित है। इनमें से दो स्थानीय निकायों में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से चुनाव प्रक्रिया पर असर पड़ेगा, हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि विधायकों के वोट हाईकोर्ट के अंतिम फैसले के अधीन रहेंगे।
FAQ
सुप्रीम कोर्ट ने किस आदेश पर रोक लगाई?
सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के 4 जून 2026 के उस आदेश पर रोक लगाई जिसमें विधायकों को नगर निगम और नगर पंचायतों के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष चुनाव में मतदान से वंचित कर दिया गया था।
हाईकोर्ट के आदेश का आधार क्या था?
हाईकोर्ट ने हिमाचल प्रदेश निर्वाचन नियम, 2015 का हवाला देते हुए कहा कि अध्यक्ष-उपाध्यक्ष का चुनाव केवल निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जा सकता है।
राज्य सरकार का तर्क क्या था?
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि 1994 अधिनियम में 2000 में संशोधन कर विधायकों को पदेन सदस्य के रूप में मतदान का अधिकार दिया गया था, और हाईकोर्ट का आदेश चुनाव प्रक्रिया के बीच में यह अधिकार छीन रहा है।
स्रोत: www.hindustantimes.com