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केरल हाईकोर्ट ने मानसिक स्वास्थ्य कानून के तहत शिशु हत्या के दोषी को बरी किया

मुख्य तथ्य केरल हाईकोर्ट ने एक महिला को उसके 15 माह के बच्चे की हत्या के मामले में बरी कर दिया। अदालत ने मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 2017 (Mental Healthcare Act, 2017) का हवाला देते हुए…

मुख्य तथ्य

केरल हाईकोर्ट ने एक महिला को उसके 15 माह के बच्चे की हत्या के मामले में बरी कर दिया। अदालत ने मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 2017 (Mental Healthcare Act, 2017) का हवाला देते हुए कहा कि महिला उस समय गंभीर मानसिक तनाव में थी और उसने आत्महत्या का प्रयास किया था। न्यायमूर्ति राजा विजयराघवन वी और न्यायमूर्ति के वी जयकुमार की पीठ ने 8 जून को यह फैसला सुनाया।

मामले का विवरण

यह मामला 2016 का है जब महिला ने अपने 15 माह के बच्चे की हत्या कर दी थी और स्वयं भी आत्महत्या का प्रयास किया था। सत्र न्यायालय ने 2023 में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने इस सजा को रद्द करते हुए महिला को बरी कर दिया।

अदालत की टिप्पणियां

अदालत ने कहा कि परिस्थितियां प्रथम दृष्टया आत्महत्या के प्रयास का सबूत देती हैं, लेकिन अभियोजन पक्ष ने धारा 309 (आत्महत्या का प्रयास) के तहत आरोप को साबित करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। अदालत ने यह भी कहा कि सत्र न्यायालय ने बिना यह सकारात्मक निष्कर्ष दिए कि आत्महत्या का प्रयास नहीं हुआ, महिला को धारा 309 से बरी कर दिया, जो कानूनी रूप से गलत है।

मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम का प्रभाव

अदालत ने मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 2017 की धारा 115 लागू की, जो आत्महत्या के प्रयास के मामले में गंभीर मानसिक तनाव का अनुमान लगाती है। इस धारा के तहत व्यक्ति को IPC के किसी भी अपराध के लिए दंडित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यह अधिनियम 2018 में लागू हुआ, लेकिन केरल हाईकोर्ट ने पहले ही इसे पूर्वव्यापी प्रभाव देने का फैसला सुनाया था। चूंकि मुकदमा 2021 में शुरू हुआ, इसलिए सत्र न्यायालय को इस अधिनियम को ध्यान में रखना चाहिए था।

अभियोजन पक्ष की दलील खारिज

अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया था कि चूंकि महिला धारा 309 से बरी हो चुकी है, इसलिए मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम की धारा 115 लागू नहीं होती। हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ने स्वयं धारा 309 को गंभीरता से नहीं लिया और सत्र न्यायालय का बरी करना सकारात्मक निष्कर्ष पर आधारित नहीं था।

धारा 309 की व्याख्या

अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 309 IPC का ध्यान आत्महत्या के प्रयास और उसके लिए किए गए कार्यों पर है, न कि चोटों की गंभीरता या मृत्यु की संभावना पर। सत्र न्यायालय का यह मानना कि कलाई और कोहनी पर चोटें मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त नहीं थीं, कानूनी रूप से गलत है।

निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने महिला की अपील स्वीकार करते हुए सत्र न्यायालय के नवंबर 2023 के फैसले को रद्द कर दिया और महिला को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

  • केरल हाईकोर्ट ने महिला को क्यों बरी किया? अदालत ने मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 2017 की धारा 115 लागू की, जिसके तहत आत्महत्या के प्रयास के मामले में गंभीर मानसिक तनाव का अनुमान लगाया जाता है और IPC के तहत सजा नहीं दी जा सकती।
  • मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 2017 की धारा 115 क्या कहती है? यह धारा आत्महत्या के प्रयास के मामले में गंभीर मानसिक तनाव का अनुमान लगाती है और व्यक्ति को IPC के तहत दंडित नहीं किए जाने का प्रावधान करती है।
  • इस मामले में IPC की धारा 309 क्यों लागू नहीं हुई? अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने धारा 309 को गंभीरता से नहीं लिया और सत्र न्यायालय ने बिना सकारात्मक निष्कर्ष के आरोप से बरी कर दिया, जो कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं था।

Source: www.thehindu.com

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